Tuesday, November 29, 2016

china-



चीन के सीयाग  कवितोत्सव के आमन्त्रण पर  वहाँ पहुचने की व्यग्रता का सबसे बड़ा कारण या आकर्षण था सीयंग क्षेत्र जो चीन का सबसे खुबसूरत प्राकृतिक स्थल माना जाता है, ये वह इलाका है जहाँ पर पहाड़ और नदियों का इतना खुबसूरत मेल है कि चीनी दार्शनिकों और कवियों का सैंकड़ों सालों से पसन्द दीदा स्थल रहा है। चीन के अधिकतर प्राचीन कवियों का स्थल रहा है यह।

मुझे दस जून को त्रिवेन्द्रम से सिंगापुर की फ्लाइट लेकर सुबह बीजिंग की फ्लाइट पकड़नी थी, यानी रात भर का सफर वह भी पूरव की तरफ, जहाँ वक्त सिकुड़ता है।

जब बीजिंग पहुँची तो बेताहशा थकी थी, बीजिंग का इतना बड़ा एयर पोर्ट और भाषाई समस्या के चलते मात्र सूचकों से काम चलाने की मश्शक्कत के साथ एक डर भी था कि लेने आने वाले महोदय कहीं वापिस लौट ना गये हों। लेकिन बाहर निकलते ही अपने नाम का बोर्ड देख कर चैन मिला। चीन में कई लोग दो नाम रखते हैं, एक चीनीं नाम, दूसरा अंग्रेजी नाम जो पासपोर्ट के लिये उपयोग में लाया जाता है। तो हंटर जी ने तुरन्त उल्टे हाश से ि हाथ मिलाया, और मुझे लेकर बाहर आयें, जहां एक और सदस्य खड़े थे, जो मैक्सिकों से आये थे, और उनका नाम था Enrique Alberto ( Enrique Alberto Servín Herrera) और स्वयं किसी अन्य कवि को रिसीव करने चल गये।
एनरिक ने मित्रता वाली मुस्कान फैंक कर सबसे पहले ही कहना शुरु किया कि मैं भारत का सम्मान करता हूं क्यों कि यह अध्यात्मिक देश है, मुझे इस शब्द से थोड़ी बहुत कोफ्त होती हैं, अपने देश में जो होता हैं उससे हम सब रोजाना वाकिफ होते रहते हैं, इसलिये इस जुमले का झुठापन कौंचता है। मैंने कहा कि ऐसा कुछ प्रभावित होने वाली बात नहीं है, यह उतना ही पुरना देश हैं जितना आपका और उतना ही क्रूर है जितने कोई अन्य देश हो सकते हैं एनरिक नें हार नहीं मानी , वे दर्शन की ओर कुछ और बड़े,,,, लेकिन मैं रूखे पन से कहा कि यदि आप अपने देश में बैठे महायोगियों और स्वामियों का सन्देश सुन कर कुछ कह रहे है तो कोई खास बात नहीं है, वर्ना प्रत्येक देश का इतिहास रोचक होता है।
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 मैं दाद दूंगी एनरिक को, कि उन्होंने हार नहीं मानी, वे कुछ ना कुछ बोलनेकी कोशिश में लगे रहे। हम दोनों को साथ ही होटल जाना था, और भाषा की जानकारी के अभाव में होटल में यह निश्चित किया गया गया कि डिनर पर मिलते है।

जब हम डिनर के लिये आये तब मुझे महसूस होने लगा कि एनरिक मात्र जुमले नहीं फैंक रहे, बल्कि वे खाफी कुछ जानकारी रखते हैं, उन्होंने विद्यापति का उल्लेख किया, फिर कथाकलि, , भारतनाट्यम और कत्थक के बारे में बात की। यहीं नहीं वे भारत के राष्ट्रगीत की कुछ पंक्तियाँ भी गा सकते थे।
निसन्देह अब मैंने भी उनकी चर्चा में भाग लेना शुरु किया। तब आश्चर्य हुआ कि वे बाल सुलभ उत्सुकता से सब कुछ जानने की कोशिश करे हैं।

यह तो मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ कि एनरिक करीब २० भाषाओं को कुछ हद तक बोल सकते थे, यहाँ तक कि चीनी भाषा को भी।

साथ में उनकी कला के क्षेत्र में अच्छी पकड़ थी। बाद में मैंने एनरिक को चीनी ओपरा के गीत गाते सुना।

दूसरे दिन हमे सीयंग क्षेत्र के लिये हवाई जहाज पकड़ना था, लेकिन ज्ञात हुआ कि वह हवाई जहाज ही रद्द हो गया। लेकिन इस वक्त और कवि भी मिल गये थे, जैसे तर्क से ओनार, डेनमार्ग से सिन्डी, और अमेरिकन डेनिस मुह, धीरे धीरे और लोग भी  हमसे जुड़ गये। अब तो हमारे लिये संवाद के नये आयाम मिल गये। हमे जानकारीमिली कि हम आधे रास्ते हवाई जहाज से जायेंगे और बाकी आध  रास्ता गाड़ी से पार करेंगे। अच्छा ही था , क्यंो गाड़ी से शहर और गाँवो को करीब से देखने का मौका मिला जता है।

हवाई मार्ग तो जैसा होता है, वैसा ही होता है, लेकिन यह जरूर मालूम हुआ कि चीन में चैकिंग की प्रणाली ज्यादा चुस्त है, बैग मे रखी चिल्लर तक को अलग थेले में रखना पड़ता है।
जब हम छोटी वैन में बैठे तो मुझे पता चला कि मेरा चश्मा बैग में नहीं है, मैं घबरा गई,,, एक तो चश्मा महंगा भी था, दूसरे बिना चश्मे के मेरे लिये पढ़ना लिखना संभव ही नहीं था। जब मैंने अपने होस्ट हन्टर महोद से कहा कि मेरा चश्मा हवाई जहाज में रह गया है तो उन्होंने बेफिक्री से कहा, चश्मा सस्ती चीज है, खरीद लेना। लेकन मेरा मुड खराब हो गया था। उस वक्त तक एक खुबसूरत सी लड़की गाइड के रूप में हम से जुड़ चुकी थी़ जो थोड़ी बहुत अंग्रेजी और अच्छी स्पेनिश बोल लेती थी। डेनिस ने कहा कि ये लड़की स्मारद्ट लग रही है, अभी तक हवाई जहाज में मिली चीजें हवाई अड्डे को सोंप दी गई होंगी तो इस लड़की को कहो। मेंने जब उस लड़की को अपनी समस्या बताई तो उसने तुरन्त हबाई अड्डे में बात की, पता चला है कि उन्हे कोई चश्मा मिला है, लेकिन उन्होंने चश्मे के केस का रंग पूछा, और जब मैंने बताया की चटख पीला, तो थोड़ी देर में चश्में की फोटो मोबाइल पर आ गई। बस यह निश्चित था कि कवियों की अगली खेप चश्में को अपने साथ ले आयेगी।

सच कहो तो मुझे इतनी खुशी हुई  कि कह नहीं सकती...

a note for Istanbul



इस्तानबुल एक शहर नहीं इतिहास की सलवटे हैं, ना जाने कितने वक्त इसमें गड्मड होकर सो गये हैं, मैं इस शहर से करीब तीन बार गुजरी और बस एक बार ठहरी. वो भी एस्कीशेर जैसे निहायत खुबसूरत शहर से लौटते हुए इस्तानबु फेस्टीवल में भाग लेना था तो मात्र तीन दिन रहना स्वीकार करके रुकी भी थी, अब तीन दिन इस्तानबुल जैसे शहर के लिये राई के दाने के बराबर होते हैं, क्यों कि मेरे पास दुपहर तीन बजे तक का ही वक्त होा था, बाद मैं कविता पाठ के लिये जगह जगह जाना होता था। मैं अकेल ही थी, और भाषा की समस्या भी थी, एक पुर्तगाली कवि भी था, लेकिन वह सुबह सुबह अकेले चला जाता था, तो मैने भी सुबह का नानश्ता करके निकलने की ठानी, इन पर्यटन स्थलों का एक फायदा होता है कि कोई ना कोई एक चौक ऐसा जरूर होता है जहाँ आप काफी कुछ देख सकते हैं,तो जाना तो टैक्सी से हुआ,,,,,एक के बाद एक मीनारे, मस्जिदें और बाड़े,,,, देखतेरहों दीमाग में दर्जहोने में वक्त लगता है। लेकिनअकेले होने काफायदा यह होता है कि यात्रा फिल्म की रील बन दृष्य दर दीमाग में उतरती जाती है, आज भी मैं आँखे बन्द कर के जालियाँ दीवारे , अहातेऔर औजार याद कर सकती हूँ। शाम को बाजारभी देख लिया बाजार तो ईरान के बाजार के सामने फीका सा लगा। जब लौटनेलगी तो एक टैक्सी ली, लेकिन ड्राइवर भाषा जानता नहीं था... रास्ते में मुझेघबराहट होने लगी क्यों कि लौटने का रास्ता जाने के रास्ते से अलग था, तो मैंने उससे पूछना शुरु कर दिया, लेकिन वह बिना कुछ कहे गाड़ी चलाता रहा, मैंने जोर जोर से उससे कहना शुरु किया कि ये रास्ता ठीक नहीं है नहीं तो वह गुस्सा गया। और बीच रास्ते में टैक्सी का दरवाजा खोल कर इशारा किया कि उतर जाओं, और कुछ इस तरह बोला कि मानों कह रहा हो कि बक बक बक बक ... मैं आराम से उतर गई,.. और एक सामने की दूकान पर जाकर पता पूछा तो ह दुखी होकर कहने लगा.. मैं दूसरी टैक्सी मंगवा देता हूं, मेंने कहा कि यह बताओं , जगह कितनी दूर है, उने कहा कि ये पीछे से रास्ता है , दस मिनिट में पहुंच जाओगी । मैं आराम से चल पड़ी और दस बीस मिनिट में अपने ठिकाने पर थी।

दूसरे दिन मैने जाते वक्त तो टैक्सी ली, क्यों कि होटलमंगवा देता है, लेकिन लौटते वक्त ट्राम स्टेशन को चल दी, और लोगो से पूछा कि कैसे लौटा जासकता है, हमे वहाँ के एकेडेमिक होटल मेंठहराया गया था, और यह बताया गया था कि इस जगह को सब जानते हैं, साथ में होटल की चाभी पर नक्शा भी बना था। इसलिये बिनाभाषा के भी लोगों को समझ में आ जाता है। पता चला किट्राम नदी के इस पार तक जायेगी, आप ब्रिजपार कर दूसरी ट्रेन लेलेना, वहाँ से पहाड़ चलते हीठिकाना है।

इस्तानबुल बेहद ऊंचा नीचा है। इसलिये पतलीपगडंण्डिया हर जगह से निकलती है। ट्राम में एक कलाकार लड़का मिल गया, जिसने कहा कि वह साथ चलता है, और उसकी मदद से मैं आराम से दो डालर में ही ठिकाने पहुँच गई। गलियों से गुजरते वक्त लगा कि अरे असली इस्तानबुल तो यह है, हर गली में कोई मस्जिद, कोई मीनार, को इमारत,,,,, बस तीसरे दिन मैं पैदल निकल गई और गलियों में भटकती रहीं, तब मुझे लगा कि इस्तानबुल की यात्रा तो अब सूरु हुई है, इस शहर को गलियों में खोजना चाहिये.... लेकिन यह मेरा आखिरी दिन था।

आज इस शहर के सीने पर जो चोट लगी है, मुझे उसका दुख है, लेकिन इस्तानबुल तो गलियों में खोजना ही है...



Sunday, November 27, 2016

इरान के कुछ पन्ने


 मैं विरोध करना चाहती हूँ
स्याह पर्दों का
और अपने ऊपर चढ़ा लेती हूँ
सुर्ख लिबास
मुझे उम्मीद होती है
कि मेरा सुर्खपना
उनके स्याह पर एक
सूराख करेगा
सच होती है मेरी उम्मीद
जब एक खातून कहती है
खुदा खैर करे
हम भी आपके से बनेंगे....

.............

कैसे उठाती होंगी
वजन
ये नाजुक इबारतें
उनके
सिर्फ
सिर्फ उनके
खुदाओं का ?????



2014 में ,  मैं इरान में थी, यह उस वर्ष की चौथी विदेश यात्रा थी, कुछ वर्ष यात्रा प्रिय होते ही हैं, हाँ इरान यात्रा मेरे लिये स्वप्न प्रिया थी,,,फरवरी में अचानक इरान एम्बेसी से फोन आया कि इस साल के फज्र पिइट्री फेस्टीवल में आपका नाम चुना गया है, कृपया कुछ कविताए और बायों डेटा भेज दे. मुझे समझ नहीं आया कि दिल्ली में इतने महारथी बैठे हैं तो यह कृपा कैसे हुई... फिर याद आया कि दो हजार पाँच में मेरी कई कविताओं के अनुवाद एक अच्छे इन्टर्व्यूह के साथ वहाँ कि प्रमुख पत्रिका में छपी थी, और अनुवादक वही परि थी, जिसकी गाथा मेरे मन में परिकथा बन गई है... संभवतया यही परिपेक्ष्य था।
खैर जब तक फज्र फेस्टीवल का कार्यक्रम शुरु हुआ, मुझे अमेरिका एलिस पार्टनोइ के बुलावे में जाना था, दोनों यात्राओं के बीच वक्त कम था। लेकिन अच्छाई यही थी कि दोनों यात्राओं में टिकिट से लेकर सारे बन्दोबस्त आयोजक ही कर रहे थे। अमेरिका यात्रा के लिए वीसा का बन्दोबस्त करना था, लेकिन ईरान यात्रा में सारा काम वे ही देख रहे थे,

,, फिर भी व्यग्रता तो थी, खास तौर से जब दस दिन पहले तक मेरे हाथ में कुछ प्रमाण ना हो... खैर जैसा कि सरकारी कामो में अक्सर होता है,,,, आखिरी सप्ताह में सारी तस्वीर साफ हुई, मुझे मुम्बई जाना था, जहाँ पर ईरान कल्चर सैन्टर मेरी पूरी तैयारी कर रहा था। मुझे बता दिया कि आप होटल मे रहें, और सारा खर्चा हम वहन करेंगे। मुम्बई में पहुंने के बाद यह मेरा सबसे सरल वीसा था, मैं आराम से ईरान कल्चर सेन्टर की चाह पीती रहीं, और वही से मेरा पासपोर्ट एम्बेसी में भेज दिया गया। दो घण्टे के उपरान्त मेरे पास मेरा पासपोर्ट वीसा सब कुछ था, कल्चर सेन्टर का एक कर्मचारी होटल तक छोड़ने तक आया। मेरे टिकिट बिजिनेस क्लास में बुक किये गये थे, तो हवाई जहाज तक पहुंचने में भी कोई समस्या नही... ओमान में पुनः होटल हाजिर,,,,

जब तेहरान पहुँची तो एक घबराहट सी महसूस हुई, बेहद थमी सी हवा थी, घुटी घूटी, हर कोई सिर नीचे किए अपने काम से काम,,, कोई खिलखिलाहट या मुस्कुराहट नहीं. यहाँ तक वीसा चैक पोस्टर भी कर्मचारी आँख तक नहीं मिलाते ,,, यहाँ पर चीन के यात्रियों की अच्छी खासी भीड़ थी, दरअसल चीन और ईरान में बड़ा दोस्ताना सम्बन्ध है.... कुछ घबराहट हुई, क्यों कि समझ नहीं आ रहा था कि कौन से गेट पर पिकअप मिलेगा।

तभी मुझे कुछ लोग हाथ हिलाते दिखाई दिये,,, मैं पास पहुँची तो पूछा,,,, इन्दिया,,,, मैंने सिर हिलाया, फिर उन्होंने मेरे नाम का कार्ड दिखाया,,,, वे मुझे लेकर सीढ़ी पर चढ़ने लगे,,, मैंने देखा कि सीढ़ी के ऊपर एक विडियों ग्राफर खड़ा पिक्चर ले रहा है, मुझे लगा कि कोई नेता होगा,.. मैं पीछे मुड़ कर देखने लगी तो पीछे कोई नहीं था... तब समझ आया की यहाँ कवि को भी इतना सम्मान दिया जाता था,

फज्र फेस्टीवल में इरान के कम से कम चारसौ कवि भाग लेते हैं, और विदेश से केवल पाँच बुलाये जाते हैं, इस बार भारत, मिश्र , इराक , बलूचिस्तान और अफ्रीका से पांच कवि चुने गये। अपने देश के कवियों को सम्मान देना अच्छी ही बात है।

हमें लेकर सात सितारा होटल आाजादी होटल ले कर आया गया, जहां पर इरान कल्चर सैन्टर के अनेक अधिकारी थे। मैंने देखा कि उनमें कोई स्त्री नहीं थी, मुझे अपने दुभाषिये से परिचित करवाया गया, और भोजन के लिये पूछा, मैं बेहद थकी थी और खास भूख भी नहीं.... भाषा के परिचय के अभाव में कुछ सम्वाद समझ नहीं आ रहा था, बाकी चार कवि अरबी जानते थे, अतः अरबी फारसी में सम्वाद की समस्या नहीं थी,, लेकिन मेरे लिये तो अरबी फारसी सब एकसी थी, इतना ही नहीं वहाँ स्त्री पुरुष का भेदभाव साफ दिखाई दे रहा था, ना किसी ने हाथ मिलाया, ना ही कोई मेरे साथ बैठा, अनुवादक हल्की बात का तो अनुवाद कर देता, लेकिन कोई गम्भीर बात होती तो चुप रह जाता,,,,, इतने शब्दों के बीच भी जब मन के सामने कोई तस्वीर ना खुले तो भाषा की सीमा समझ में आती है



In the 1950s, the Omidvar brothers travelled the Congo, the Arctic and the Andes on motorbikes and in a 2CV, here is the younger brother, they have travelled whole world in 1950 to 1960 , here is younger brother in Teharan -Iran

जब मैं ईरान में थी, तो मैंने देखा कि पूरा ईरान इराक के खिलाफ भावनाओं से अटा पड़ा था, वहाँ "वार हाउस' हैं जो इराक ईरान की कहानी के तथ्य को इस तरह से प्रस्तुत करता है कि लोगों मेंनफरत की आग ना बुझ पाये. हर चौराहों पे इराक ईरान युद्ध के शहीदो की मूर्तियाँ थी,
एक कवि शाहरूख ने बताया की समकालीन ईरानी कविता मुख्यतया युद्ध कवितायें ही हैं।
हर स्थानीय फिल्म युद्ध को घटना बनाती है। आज भी नवयुवकों को पढ़ाइ के बाद फौज में कम से कम3-4 साल काम करना पड़ता है, इजराइल की तरह....
वे चीन के प्रति नरम है, भारत को भी नरम दृष्टि से देखते हैं,,
वहां जाकर मुझे प्रेस टीवी देखते वक्त पहली बार ( मेरा अज्ञान है यह , मानती हूँ) पता चला की एक ऐसा समुदाय हैं जो अपने को मुस्लिम तो मानता है, लेकिन डायरे्क्ट खुदा का बन्दा। और शिया सुन्नी दोनों के खिलाफ, कुछ कुछ इसाई धर्म के "बन्दोकोस्त समुदाय" की तरह जो अन्य ईसाइयों की तरह ना क्रिसमस मनाते हैं, ना गुड फ्राइडे।
मुझे ईरान की यह रणनीति बेहद चौंकाने वाली लगी कि वे इराक की मदद को तैयार हो गये, फिर समझ में आ गया कि वे अमेरिका के प्रभूत्व को चुनौती देने को और अपने धर्म स्थान की रक्षा के लिये तैयार हुए होंगे...
राजनीति बेहद चक्करदार बन्द गलियाँ है, भूल भुलैया भी नहीं....

ईरान के सन्दर्भ में मुझे शुरुआत से बात करनी थी, लेकिन मैं आज के राजनैतिक सन्दर्भों को ध्यान रखते हुए आखिरी दिन हुए सम्वाद से अपनी बात रखती हूँ।
निसन्देह वैश्विक साहित्यिक सोच के अनुरूप अरब और इस्लामिक देशों के साहित्यकार भी साम्यवादी सोच को महत्व देते हैं, लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ जब मुझे इराक के कवि अलि और अरबेनिया के कवि अजरुद्दीन के बारे में पता चला कि वे सक्रिय राजनीति में है, जहाँ अलि अल शाह मेम्बर आफ पार्लिया मेन्ट हैं वही अजरुद्दीन मेयोबि मन्त्री भी रह चुके हैं।

अलि अल शाह ने स्विटजर लैण्ड में पढ़ाई की है, इसलिये वे अंग्रेजी से वाकिफ है, लेकिन अजरुद्दीन मेयोबि मात्र अरबी और थोड़ी बहुत फ्रैंच बोल पाते थे। लेकिन सम्वाद के लिये खुलापन अजरुद्दीन मेयोबि में था, वे भारतीय राजनैतिक परिवर्तन से वाकिफ थे।
मैंने उन से पूछा कि आप लेखन, पत्रकारिता और राजनीति को एक साथ कैसे सम्भाल पाते हैं, क्यों कि तीनों चीजें तीन अलग दिशाओं में जाती हैं तो उन्होंने बड़ा सटीक जवाब दिया

आम जनता विचारधारा को नहीं देखती, उसके लिये सड़क, मकान, रोजगार, जैसे मसले अहम होते हैं, इसलिये उसे अलग कर देखना बेफकूफी है.... हाँ लेखक के रूप में मुझे ध्यान रखना है कि मेरी वैचारिक दृष्टि प्रभावित तो नहीं हो रही है। पत्रकार के रूप में मेरे सामने केवल यथार्थ रहता है....

Friday, November 25, 2016

मुझे राजतन्त्र में विश्वास है। - एडिनबरा



अब मैं एडिनबरा के म्यूजियम में घुस गई, दरअसल यहाँ आने की वजह ठण्ड से बचना था, इतने कपड़े लादने पर भी कंपकंपी नहीं रुक रही थी। लेकिन भीतर आते ही लगा कि सही निर्णय था। जहाँ सड़के खाली थी, यह जगह गहमागहमी से भरी, लगता है कि आधा शहर यहाँ है। खासतौर से बच्चे वाले लोग, एक तो यहाँ कोई टिकिट नहीं, दूसरे बच्चों के लिये खास इंतजाम, जैसे कि उनके लिये चित्र बनाने के लिये पेपर पेंसिल, क्राफ्ट कक्ष और खेल के छोटे छोटे खिलौने।
हर देस की कला और संस्कृति के नमूने यहाँ रखे गये थे। मैं  बस एक के बाद एक कक्ष में घूमती हुई कलाकृतियों का जायजा लेती रही, विचित्र घण्टेघर, आकृतियाँ ,मिस्र् की ममि से लेकर  विन्टेज गाड़ियाँ, ओह, दीमाग में कितना रखा जा सकता है भई, आखिर में बस केमरा क्लिक होता और दीमाग सुप्तावस्था में चला गया। बस एक दुख था कि भारत का कोई कक्ष नहीं था, ना जाने हम लोग अपनी संस्कृति के नाम से इतने आश्वासित रहते हैं किकुछ करना ही नहीं चाहते।

मुझे और भी घूमना था, भूख भी लगने लगी थी, बेटी ने बताया था कि The peoples Story नामक जगह जरूर देखना, मैं इसी जगह को खोजने बाहर निकली, अन्ततः इस म्यूजियम में पहुँची। यह भी अपने तरीके का संग्रहालय है जिसमें आम आदमी की कथा कहती है। यहाँ उस काल की कहानी है जब बेहद गरीबी में आम आदमी रहते थे, और जीविका के संघर्ष करते थे। यहाँ समाज के एक बड़े तबके का संघर्ष दिखाई देता है। एक  एक चित्र या प्रतिमा के साथ लिखी कथा पढ़ते पढ़ते काफी वक्त बीत गया। कस कर भूख लगी तो मुझे जर्मन बर्गर की याद आई, मैं म्यूजियम से बाहर निकल कर एक खाली बेंच में बैठ कर खाने लगी। भूख और ठण्ड में जंग छिड़ी थी, भूख कहती थी कि रुको मत खाये जाओ, ठण्ड  कहती बस करो, हीं अन्दर जाओ, वास्तब में बर्गर स्वादिष्ट था, और बड़ा भी। बगल में एक बालकनी दिखाई दे रही थी, कहा जाता है  कि यहीं से स्काटलैन्ड की आजादी का आह्वान हुआ था।
सामने एक पीली इमारत थी, जिसका नाम था, म्यूजियम आफ एडिनबरा, मैंने उसी में घुसने में भलाई समझी, ये म्यूजियम तो निशुल्क था,लेकिन एडिनबरा के बारे में फिल्म के दाम देने होते थे। मैं म्यूजियम में घुस गई। दरअसल यह स्काटलैण्ड की युद्ध की कहानी थी, कौन युद्ध का नायक किस युद्ध में क्या जीता आदि का विस्तार से वर्णन था। बेगपाइपर के लिये युद्ध की वेशभूषा का महत्व हुआ करता था, लेकिन स्काटी ढ़नी केवल दो डालर सालाना मुहैया करवाते थे। कहा जाता है कि ड्रेस की मारामारी के सैनिक किसी ना किसी तरह से वेशभूषा हथियाना चाहते थे। कभी कभी तो साथी सैनिक के मरने पर पहले उसकी पौशाक  हथियातेफिर उसके शव के बारे में सोचते।
युद्ध हमेशा सेनिकों की सहायता से जीते जाते रहे हैं, लेकिन वे ही सबसे ज्यादा उपेक्षित रहते रहे हैं, युद्ध का इतिहास हर तरीके से कठोर है।

शाम होने लगी थी, मैंने बाहर निकल कर कैमरे को क्लिक क्लिक करना शुरु कर दिया, मैं कोई खास फोकस नहीं करती, बस क्लिक करती जाती हूँ.....

आज मेरा सीजन टिकिट खत्म हो चुका था, तो सरकारी बस पकड़नी थी, इसलिये लौतने की जल्दी नहीं थी, सबों विदा जो कहना था, कल फिर सुबह की फ्लाइट से लौटना है, गेस्टहाउस मालकिन ने अगेल दिन के लिये टैक्सी का इंतजाम कर दिया था, लेकिन मजेदार बात यह थी कि उन्होंने मुझसे कहा कि चाभी मेज पर रख कर दरवाजा बन्द करके चली जाऊँ। यानी कि विदा के वक्त कोई नहीं होगा गेस्टहाउस में।
रात को सामान पैक करने  के लेटने के बाद नीन्द लेना मुश्किल था, क्यों कि टैक्सी सुबह पाँच बजे आनी थी, और यहाँ टैक्सी वाले इंतजार नहीं करते, आप सड़क पर खड़े है तो ठीक, नहीं तो चले जायेंगे।
निसन्देह सामान लगाते लगाते वक्त लगा, बस फिर तो झपक ही ली, क्यों कि सामान तीसरी मंजिल से खुद ही उतार कर लाना था।

सुबह मैं चार बजे से ही नीचे थी, और साड़े चार बजते ही सड़क पर खड़ी हो गई, इतनी सुबह, इतनी ठण्ड में खड़े होना मेरे लिये चमत्कार से कम नहीं था....
अन्ततः टैक्सी ठीक पाँच बजे पहुँची...
टैक्सी ड्राइवर भी खूब बातूनी था, लगातार बाते कर रहा था़ किसी छोटे गाँव का था और एडिनबरा में टैक्सी चलाता था। मैंने चलते चलते उससे भी यही सवाल दागा, स्काटलैण्ड की स्वतन्त्रता के लिये वोट करंगे या नहीं?
वह एक क्षण  को चुप हुआ फिर बोला, मुझे राजतन्त्र में विश्वास है।
हवाई अड्डा पहुँचा था, मैं चुपचाप दाम चुका कर पउतर गई..