Monday, March 6, 2017

स्पेन के अकरुना में गेलेसिया भाषा और संस्कृति से रूबरू होते हुए



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अपनी भाषा और कौम से अप्रतिम स्नेह का भाव मैंने दो भाषाई समुदाय में खास देखा एक वैल्श , जो ठसक के साथ इंग्लैण्ड के सामने खड़े होकर , उसका भौगोलिक भाग होते हुए भी अपनी भाषा को अपनी पहचान बना ले़। वैल्श के बारे में वैल्श से सम्बन्धित संस्मरणों मे लिख चुकी हूँ। लेकिन इस बार जब मुझे स्पेन के गैलेसियन प्रान्त में कविता पाठ का आमन्त्रण मिला, तब मैंने गैलिेसियन वैचारिकता को स्पेनिश संस्कृति से भिन्न नहीं समझा था। हालांकि आमन्त्रण कर्ता से मेरी संक्षिप्त मुलाकात चीन में हो चुकी थी, लेकिन अधिक संवाद नहीं हो पाया था। लेकिन जब मुझे कल्चर वीसा की समस्या हुई तो जिस तरह से योलण्डा नें वीसा अफसरों से एक तरह की लड़ाई लड़ी, वह उस नाजुक सी लड़की के दूसरे पक्ष को दर्शा रही थी़। जब योलण्डा ने स्पेनिश वीसा अफसरों को गैलेसियन भाषा के साहित्य का इतिहास अपने लम्बे लम्बे खतों में पढ़ा दिया तो मुझे समझ में आगया कि गैलेसियन भाषा और साहित्य अपने देश में अल्पसंख्यक स्थिति का सामना कर रहा है़ , लेकिन वहाँ के कलाकार और साहित्यकार अपनी जंग बेहतर तरीके से लड़ रहे थे।   


 


 अ करोना, गैलेसियन प्रान्त के नगर के हवाई अड्डे से निकलते ही योलाण्डा आतुर सी दिखाई दी, गले मिलते हुई बोली, “क्या हुआ तुमने बाहर निकलने में इतनी देर क्यों कर दी, मैं तो घबरा गई थी कि कोई नई समस्या तो नहीं?”
 मैंने हंस कर कहा,-“ अच्छा ही हुआ कि सारी समास्याएँ आने से पहले ही दूर हो गई, अब अच्छा वक्त बीतेगा। “कार में बैठते ही योलाण्डा ने सबसे पहले मुझसे कार के साफ ना होने के लिये माफी मांगी, कार पर पक्षियों की बीठ आदि पड़ी थी, धूल भी जमी थी, मैंने हंस कर कहा, नहीं कार के लिए माफी मंगने की जरूरत नहीं, ये तो खासतौर से कवि की कार लग रही है, पंछियों दरख्तों से प्रेम करती हुई सी।

योलाण्डा शहर के बारे में लगातार बताती रही कि यह शहर कभी गेलेसियन साम्राज्य का महत्वपूर्ण हिस्सा था, जो अपने महत्वपूर्ण बन्दरगाह के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था। इसे The harbour of the brave men". भी कहा जाता था। समुद्री बन्दरगाह होने के कारण यह अति प्राचीन काल से महत्वपूर्ण स्थान रहा है, और युद्ध का केन्द्र भी रहा है। सामुद्रिक प्रभाव ने इसे व्यापार के कारण भी मजबूति दी, लेकिन स्पेन के गृह युद्ध के बाद शहर की तस्वीर बदली और खूबसूरत इमारतों से अटा यह शहर बेढंगी गगन चुम्बी इमारतों से अट गया।
योलण्डा अपने शहर और भाषा से इतना जुड़ी है कि उसने कहा –“ रति, मैं सोचती हूँ कि किसी भी शहर की पहली तस्वीर खूबसूरत होनी चाहिये, इसलिये तु्म्हें  होटल ले जाने से पहले शहर के खूबसूरत हिस्सों को दिखाना चाहती हूँ, यदि तुम थकी ना हो तो। “

मैंने कहा- थकने की  क्या बात है, आराम से बैठ कर ही तो आई थी, चलों शहर देखते हैं।

हालांकि मेरे इस सफर में भी अड़चन आ गई थी, एक रात पहले लण्डन में अपनी बेटी के घर से मैंने जब वेब बुकिंग करनी चाही तो कहीं कुछ गड़बड़ आ गई, और जब मैं हवाई अड्डे पर पहुँची तो मेरा नाम ही लिस्ट में नहीं था, वो तो इसी तरह की समस्या पहले भी आ चुकी थी, इसलिये वहाँ डैस्क पर खड़े नौजवान ने  मास्टर कम्प्यूटर पर चैक करने का सोचा, और गलती पता पड़ी़ । तब तक काफी वक्त जाया हो गया था, तो मुझे लगभग भाग कर अनेक अड़चनों से पार करते हुए जाना पड़ा। इन छोटी फ्लाइटों में सारा सामान हाथ में होता है, तप 10 किलों का बैग हाथ में, एक कम्प्यूटर बैग पीठ पर....
और जहाज में भी सबसे आखिरी सीट मिली, इसलिये बाहर निकलने भी देर हो गई।

लेकिन मैं सब कुछ भुला कर बस इस कवित्वमय वातावरण को अनुभूत करना चाह रही थी़।

वह सब से पहले एक समुद्र तट से काफी उँचे स्थान पर ले गई, जहाँ से शहर और समुद्री इलाका किसी परीकथा सा लग रहा था। हवा की तेजी सूरज के ताप को टिकने नहीं दे रही थी।
सच कोई दृश्य इतना भव्य हो सकता है क्या?  मैं सोच नहीं पा रही थी। शाम के आठ बजे के बाद का वक्त था, इसलिये कुछ कुछ स्थानों पर श्यामल शाम के कदम पड़ चुके थे, लेकिन धूप ने अभी तक साहस नहीं चोड़ा था, समन्दर नील, पीत ओर हरित वर्ण में चितकबरा सा लग रहा था। नई बहुमंजिली इमारते पुराने शहर से बेमेल तो लग रही थी, नई दस्तक की सूचना भी दे रही थी।
इसके उपरान्त योलाण्डा ए कोरुना शहर की पारम्परिक मकान निर्मण के बारे में बताते हुए विस्तार में बताने लगी कि सफेद रंग के काँच के जाले किस तरह मकानों के तापमान को ठीक रखने में मददगार होते रहे हैं, लेकिन कुछ युद्धों और गृह युद्ध के उपरान्त इस प्रान्त की आर्थिक अवस्था इतनी खराब हो गई कि सस्ते बहुमंजिली मकानों का निर्माण होने लगा, जिससे शहर की भव्यता पर असर हुआ।
अ कोरुना शहर मुझे तो गुड़िया के शहर सा लग रहा था। मेरा होटल भी एक केन्द्र में था, जिससे बाजार और दृश्यनीय इमारते करीब ही थीं। गेलेसियन भाषा के प्रसार हेतु, म्यूनिसिपलिटी आमन्त्रि कवि के लिये पंचसितारा होटल में स्थान देती है, अतः होटल भव्य और आरामदायक था।
योलाण्डा ने मुझे बताया कि कल का दिन आश्चर्यों का दिन है, तुम्हे बेहद खूबसूरत जगह ले जाने का प्लान है, इसलिये कल सुबह नौ बजे तक तैयार रहना,
भव्य होटल के खूबसूरत कमरा मेरी नीन्द का इ्ंतजार ही कर रहा था,  और मैं बिना किसी पढ़ाई लिखाई के आराम से सो गई़़...

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सात जुलाई यानि कि अ कोरुना पहुँचने के दूसरे दिन हम करीब नौ बजे सेन्त्र्यागो के लिये रवाना हुए, योलाण्डा ठीक साड़े नौ बजे होटल की लाबी में पहुँच गई, मैं उसका इंतजार ही कर रही थी। तब तक सेन्त्र्यागो मेरे लिये एक अबूझ पहेली ही  थी। सोचा कि नेट खोल कर देखूँ, लेकिन फिर सोचा कि अबूझेपन का अपना मजा है, अनजाना इतिहास रहस्य मयी कथा की तरह पर्दा उठाता है। मुझे योलाण्डा की वक्तृत्व कला का  अनुमान भी हो चुका था, तो सोचा कि वो जितना समझा देगी उतना तो नेट पर लिखा भी नही होगा। लेकिन इस बार योलाण्डा ने कार चलाते हुए कहा,-“देखो, जहाँ मैं तुम्हे ले चल रही हूँ, बहुत पुरानी जगह है,निसन्दह तुम्हे पसन्द आयेगी, लेकिन मैं चाहती हँ कि तुम पहले देखो, फिर समझों।“

योलाण्डा फर्राटे से कार चलाती है, बता रही थी कि--मैंने  अपनी जिन्दगी का सबसे पहला बड़ा काम यही किया कि अट्ठारह की होने से पहले ही कार चलानी सीखी और पहला काम कार खरीदना था,वही मेरी जिन्दगी की पहली आजादी थी।
रास्ता बेहद खूबसूरत  हरा -भरा था, दोनों ओर पहाड़ियों से गुजरते रास्तों में दोनों ओर नन्हें- नन्हें पुल बने हुए थे। छोटी -छोटी यूरोपीय बस्तियाँ थी।
मैं यह कभी नहीं समझ पाई कि इन दूरस्थ जंगलों में बसी बस्तियों में लोग कैसे रहते होंगे, कैसे वे अपनी जरूरतें पूरी करते होंगे। केरल में तो सड़क से यात्रा करो तो आदम बस्ती खत्म होने का नाम ही लेती, यहाँ कान से कान सटाये शहर रहते हैं। ग्रैण्ड रोड पर बकरियाँ , कुत्ते बिल्लियों के साथ लोग बाग भी भाग भाग कर सड़कें पार करते रहते हैं।

तेज रफ्तार से चलते हुए भी हमे अपने गन्तव्य तक पहुँचने में डेढ घण्टा लग गया था।

कुछ पहाड़ी इलाके में बसा हुए शहर की पहली सुगन्ध बड़ी भीनी थी, एसा लगा कि मानों हम कोई पुरानी यूरोपीय तस्वीर देख रहे हों, बेहद पुराने वक्त की प्राचीरें, इमारते और मकान का खासा गेलेसियन अन्दाज। गेलेसियन जन फूलों से खासा प्यार करते हैं तो हर छज्जे से झाँकते लटकते फूल। योलाण्डा अच्छी खासी इंगलिश जानती हैं, अन्यथा मुझे इस तरह की यात्राओं में अधिकतर गूंगा बन कर ही रहना होता है।

सड़के संकरी थी, इसलिये गाड़ी पार्किंग की जगह मिलना मुश्किल था, लेकिन योलाण्डा ने बड़ी खू  बसूरती से दो गाड़ियों के बीच अपनी लम्बी गाड़ीपार्क कर ली। और बोली, जो भी सामान लेना हो, ले लो, अब हम शाम को ही वापिस लौटेंगे यहाँ। धूप चमक रही थी, स्वेटर आदी की जरूरत महसूस नहीं हो रही थी, तो मैंने स्वेटर को वहीं छोड़ा और कैमरा और पर्स लेकर उतर गई। गलियाँ साफ सुथरी थी, लेकिन शहर की गन्ध बता रही थी कि यह सदियों का करिश्मा है।

योलाण्डा ने मुझ से पूछा,-- कैसा लगा रहा है?

मैंने कहा - ऐसा लग रहा है कि कोई पुराना एलबम देख रहे हों, इतनी ऊँची प्राचीरें, भव्य इमारतें लेकिन इतनी सटी, मानों कि एक दूसरे के कंधों का सहारा ले रही हों,
ये एक प्राचीन नगरी है, जिसके चिह्न  रोमन काल से भी पहले के हैं, कहा जाता है कि  44 AD  Saint James, जिनकी हत्या जेरुसलम मे  सिर काट कर कर दी गई थी, वे इससे पहले स्पेन , गेलेसिया से धर्मप्रचार के लिये गये थे़ लेकिन वर्जिन मेरी के किसी सन्देश का अनुकरण कर के जेरुसलम लौटे थे। गेलेसियन प्रान्त में धर्म प्रचार के उपरान्त जेरुसलम वापिस लौट रहे थे तो उनकी सिर काट कर हत्या कर दी गई, लेकिन उनके शिष्य उनकी मृत देह को जाफा ले गये जहाँ पर एक एक स्टोन शिप यानी को जहाज की आकृति में बने श्मसान ने उन्हें सन्त की देह को गेलसिया ले जाने का संकेत दिया। गेलेसिया में उन्हे स्थानीय रानी से शव दफनाने की प्रार्थना की तो उसने एक कठोर शर्त रख दी कि वे पहाड़ी से बैल ले कर आयें, कहा जाता है कि उस पहाड़ी में एक ड्रैगन रहता था जो आनेवाले को खा जाता था, लेकिन जब शिष्य वहाँ पहुँचे तो डैग्रन वाली पहाड़ी पर आग लग गई, और उन्हें कुछ नहीं हुआ। बैल भी जंगली थे, जो किसी को भी मार देते थे, लेकिन सन्त के शिष्यों को देखते ही शान्त हो गये। शिष्यों ने जहां सन्त की देह रखी थी, वही उनका केथेड्रेल Cathedral  बना दिया।Cathedral of Santiago de Compostela को अंग्रेजी में  Way of St. James कहते हैं।इस  तीर्थमार्ग नौवी सदी में मान्यता मिली और ग्यारहवीं सदी से लोकप्रिय होने लगा।   इतिहास के अनुसार यह तीर्थ मार्ग प्राचीन रोमन व्यापारिक मार्ग का अनुकरण करता है़ । रोमन इसे Finisterrae  कहते थे, जिसका अर्थ है  the end of the world or Land's End i। संभवतः इसलिये कि आकाश गंगा का आखिरी तारा इस ओर है़
आज इसे यूरोपीय कल्चर मार्ग कहा जाता है। वर्लड हेरिटेज के रूप में मान्यता मिल गई है़। इस मार्ग के बारे में भी दन्त कथा है कि एक मछुआरे को तारको से जानकारी मिली कि यहाँ सन्त जेम्स की भस्म दफनाई गई हैं, तो उसने अन्य लोगों को जानकारी दी। यह भी कहा जाता है कि  Moors के ८०० साल के  शासन काल में  ईसाई समुदाय की  जनता ने   मान्यता मांगी थी कि यदि उनका शासन खत्म हो जाये तो वे अपनी लगान का एक हिस्सा सन्त जेम्स के केथेड्रिल को देंगे। केथेलिक विचारधारा के लोगों को मोरक्का से आये मुस्लिम धर्मानुयायी का शासन कठोर लग रहा था। कहा जाता है कि युद्ध के दौरान को घड़सवार हाथ में तलवार लेकर लड़ने आया था, जिसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
मूर शासन काल ने भी स्पेनिश राज्य के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। क्यों कि यह अरब, चीन आदि से विज्ञान , ज्योतिष और अन्य कलाओं को लाया था।
सन्त्यागो रोम और जेरुसलम के अलावा सबसे महत्वपूर्ण ईसाई तीर्थस्थल है, जो अपने तीर्थ मार्ग के कारण प्रसिद्ध है। विभिन्न यूरोपीय देशों से लोग पैदल चल कर यहाँ पहुँचते हैं। तीर्थ यात्री के पास एक लाठी और प्रतीक रूप में सीपी रहती है। स्पेन के प्रमुख तीर्थ मार्ग में जगह जगह धर्मशालायें हैं, जो बहुत सस्ते में यानी कि पाँच दस यूरों मे रात को सोने के लिये एक बिस्तरे की सुविधा देती हैं।
मैं और योलाण्डा प्रमुख कैथेड्रेल केपिछले भाग में उतरे थे, अतः पूरा ध्यान गलियों और सटे सटे मकानों पर था। बिल्कुल जयपुर सी एक दूसरे को काटती गलियाँ लेकिन दोनो तरफ अधिकतर दुमंजिला मकानो की खिड़कियों से लगभग एक से लाल फूलों वाले गुलदस्ते, फूलवारियों से भरी संकरी बालकनियाँ, योलाण्डा मुझे एक घर नुमा होटल के भीतर ले जाती है, देखों, यही इस शहर के घरों का पारम्परिक स्वरूप है, यह होटल गेलेसियन घर की छवि रखता है, यहाँ लोग आकर पढ़ते लिखते हैं, कवि कलाकारों के लिए बेहतर जगह है। सच, होटल क्या एक दुमंजिला घर था, जिसके आंगण में बेतरतीब झाड़ियों के बीच कुछ मूर्तियाँ बनी हुई थीं। लेकिन जो भी कुछ बेरततीब था, वह मन को तरतीब करने के लिये जरूरी था।

सड़के उँची नीचीं थी, सड़के क्या गलियां ही कहो, ओर हर चौथे कदम पर किसी ना किसी भव्य इमारत का कोना या गुम्बद ध्यान खींच लेता था। रास्ते में इक्के दुक्के तीर्थ यात्री जो पीठ पर लादी थैले टांगे, हाथ में लाठी लिये चुपचाप चलते आ रहे थे। किसी चौराहे पर क्रास का निशान तो किसी में मानव निर्मित झरना, हम गलियों से गुजरते जा रहे थे, और हर गली के मुहाने पर या बीचों बीच कोई ना को भव्य इमारत या वास्तु का अप्रतिम टुकड़ा दिख ही रहा था। अन्ततः हम प्रमुख केथेड्रल के विशाल प्रांगण में पहुँचे, जहाँ पर असंख्य यात्री, तीर्थ यात्री आराम कर रहे थे। धूप दिपदिपा रही थी, फोटोग्राफी के लिये बड़ी अच्छी स्थिति थी। केथेड्रेल का मुख्य भाग प्लास्टिक की शीटों से ढंका था, शायद को मरम्मत का का चल रहा था। योलाण्डा दुखी थी, तुम इसे असली रूप में देखती तो समझती कि ये कुछ अलग ही तरह की जगह है़।
योलाण्डा का जन्म इसी पुण्य भूमि मे हुआ था, उसका परिवार कई पीढियों से यहाँ बसा था। उसकी माँ का जन्म भी यहीं के एक मकान में हुआ़ था। इसलिये योलाण्डा एक एक इमारत क्या एक एक गली का इतिहास जानती थी, वह लगातार मकानों और गलियों के बारे में बताती भी जा रही थी। लेकिन मेरे लिये इतना सब याद रखना सम्भव ही नहीं था। जब हम केथैड्रल के भीतर जाने को तैयार हुए तो पता चला कि भीतर प्रार्थना चल रही है जो दुपहर के दो बजे के बाद खत्म होगी़ । योलाण्डा और मैंने भोजन के बाद आने का विचार किया।  और हम शहर की ओर चल दिये, जहाँ अधिकतर घरों को होटलों के रूप में बदल दिया गया है।

Sir Walter Raleigh ने तीर्थयात्रियों का इन खूबसूरत पंक्तियों में वर्णन किया है।
Give me my scallop shell of quiet;
My staff of faith to walk upon;
My scrip of joy, immortal diet;
My bottle of salvation;
My gown of glory, hope’s true gauge
And then I’ll take my pilgrimage.


होटलों में बड़ी भीड़ थी, तो योलाण्डा ने कहा कि मैं तुम्हे सामने वाले बगीचे में ले चलती हूँ, यह यहाँ के लोगों की जीवन रेखा है, बचपन में मेरी माँ हम भाई बहनों को लेकर यहाँ  हमेशा आया करती थी़। यह विशाल बगीचा ना केवल लोगों का अभय स्थल है बल्कि अनेक विश्वविद्यालयी विद्यार्थियों  का आराम घर भी रहा है। जी हाँ सन्त्रयागो शैक्षणिक नगरी भी रहा है ।

यहाँ यूरोप के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय रहे हैं। योलाण्डा बता रही थी कि एक वक्त दक्षिण अमेरिका, मैक्सिकों आदि से छात्र यहां पढ़ने के लिये आया करते थे, योलाण्डा की माँ ने इसी विश्वविद्यालय से बाटनी में ग्रेजुएशन किया था। योलण्डा की भी स्कूली और काफी कुछ कालेज की शिक्षा इसी शहर में हुई, बाद में परिवार अ कोरुना चला गया तो उन्होंने आगे की पढ़ाई वहाँ से की।

यह बगीचा कई विश्वविदयालयों के बीचो बीच स्थित है, दरअसल यह एक पहाड़ी नुमा जमीन पर ही बना है , इसलिये नगर और विद्यालयों की इमारते बगीचे से देखी जा सकती हैं। इस बगीचे में घुसते ही दो अधेड़  स्त्रियों की मूर्तियाँ दिखाई दी। योलाण्डा ने सबसे पहले यही कथा कही। युद्ध की विभीषिका के बाद जब यह नगरी शोक में डूबी थी, काले और सलेटी रंगों के अलावा कोई रंग दिखाई ही नहीं देता था, उस वक्त दो वृद्ध महिलाएँ, जिनमें से एक अविवाहित थी, दूसरी विधवा, दिन के ठीक दो बजे, पूरी तरह से सजधज के विश्वविद्यालय से सटे उपवन में टहलने निकल आती थी, लोग उन्हें टू ओ क्लाक के नाम से पुकारते, युवक भद्दे मजाक भी करते, लेकिन वे मानों अपनी उपस्थिति से शोक के रंग को मिटा देना चाहती थी। उनकी मृत्यु के बाद उनकी मूर्तियाँ लगाई गई, क्यों कि उन्होने एक तरह से शोक और दुख को कम करने का काम किया था़।।

एन दो बजे, दुपहरी को तेज देती हुई
अपनी पलकों पर  आसमान भर
होंठों को सुर्ख सजा

यूँ तो झुर्रियाँ उनके चेहरों पर
तितली सी मण्डरती रहती है
मैंण्डक हथेलियों पर थरथराते रहते हैं
कमर पर झूकी बोगनविला
पावों में जाकर सो जाती है

फिर भी वे निकल आती हैं
ठीक दो बजे, सूरज से आँख मिलाती हूई
सलेटी काले रंगों में लालिमा भरती हुई
जीती हुई, जीने का इशारा करती हुई

वे दो बजे की देवियाँ
आज भी खड़ी हैं जवानी के उपवन में


हम बगीचे में आगे बढ़े, खूबसूरत बड़ा सा बगीचा, योलाण्डा बताने लगी कि यह बगीचा इस शहर की धड़कन रहा है, वे जब छोटी थी तो माँ और भाई के साथ बगीचे में खेलने आती थी, बगीचा पहाड़ी के ऊपर था, जिसके एक और विश्विद्यालय भी था। योलाण्डा की माँ ने इतने स्तर के विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी, लेकिन उनकी शिक्षा घर परिवार के दायित्व में जाया हो गई। योलाण्डा की नानी की कपड़ों की दूकन थी, जिसे हम आज बुटिक कहते हैं, तो वे उसमें व्यस्त रहा करती थी, और नाना को अल्जाइमर हो गया था, जिनकी देखभाल योलाण्डा की माँ ही किया करती थीं।

बगीचे में गेलेसियन लेखकों, कवियों की ताम्बे की मूर्तियाँ बड़े रोचक तरीके से बैंचों आदि में बैठी हुई दिखाई दे रही थी़

हम लोग दुपहर के भोजन  के लिये एक रैंस्त्रों में आए, जब भी मैं देश से बाहर जाती हूँ मैं भोजन को पूरी तरह से होस्ट पर छोड़ देती हूँ, कारण यह है कि धिकतर होस्ट अपने इलाके के बढ़िया भोजन के बारे में जानते हैं, और मैंने देखा कि बढ़िया भोजन सिर्फ बढ़िया होता है यदि अपनी जिह्वा को स्वाद  महसूस करने को छोड़ दिया जाये तो। एक तरह से में भोजन प्रेमी हूँ। योलण्डा बड़ी खुश थी, क्यों कि वे भी भोजन प्रेमी है, और मेरे खुले स्वाभाव के कारण अपनी तरफ से बढ़िया भोजन करने कराने का आनन्द उठ सकती थी। बातों बातों में उसने एक भरतीय कन्नड़ कवयित्री के बारे में बताया जिसे वे किसी वर्कशाप में मिली थी, कि वे महिला रोजाना शाम को अपने बैग से कागज में लिपटा बासा खाना निकाल कर रैंस्त्रा के बैरे को गरम करने को देती थी, शायद वे महिला खाना भारत से बना कर ले गई थी।

खाने के बाद हम शहर की गलियों से गुजरने लगे, योलण्डा बेहद विचित्र बातें बताती रहीं। जैसे कि उसने एक ऐसी गली दिखाई जो बस इतनी चौड़ी थी कि एक आदमी दोनों हाथ फैला कर दोनो तरह की दीवारें छू लें, योलाण्डा ने मुझे उसमें खड़े होकर फोटों खिंचवाने को कहा तो अचानक मुझे याद आ गया,---“ प्रेम गली अति संकरी , जा मैं दो ना समाये”   ये तो जीता जागता उदाहरण था। मैं अपने आप ही खिलखिला उठी।
दूकाने लगभग उसी तरह से दोनों ओर बनी थी,जैसी कि जयपुर में छोटी चोपड़, बड़ी चोपड़ में दिखाई देती हैं। दूकानों के सामने लम्बी पोल, यानी की छज्जे जिनके ऊपर कभी घर हुआ करते थे। चलते चलते एक जगह योलण्डा रुक गई और  कहने लगी कि ऊपर देखो , मैंने देखा कि एक चौकोर लकड़ी का टुकड़ा छत पर था, योलाण्डा ने बताया कि ये दरअसल गुप्त खिड़की है, जो अधिकतर ऊपर बने मकानों के फर्थ पर बनी होती थी, जिसमें में से घर की स्त्रियाँ झांक कर नीचे देखती और फिर गपशप के लिये विषय खोजा करती थीं। दरअसल दूसरों की जिन्दगी में झांकना आदमी के लिये हमेशा से मनोरंजन  का विषय रहा है।

थोड़ी देर बाद हम फिर प्रमुख चर्च की तरफ गये, जिसमें सन्त की मूर्ति थी. जैसा कि हमेशा होता हैं,  गिरिजाघर बेहद भव्य और सुन्दर था, इनती भीड़ भाड़ वाली जगह में भी भीतर बेहद शान्ति थी.भव्य दीवारे, भव्य मूर्तियाँ , नक्काशी दार छत, हम चुपचाप उस पंक्ति में खड़े हो गये जो सन्त के पीछे जाती है, सन्त को पीछे से आलिंगन किया जाता है, और यह काम बेहद शान्ति से किया जाता है। लोग आलिंगन करते हुए मन्नत मांगते  हैं।
जब हम नीचे उतर तो चुप थे, लेकिन बाहर आते ही योलण्डा हंस पड़ी, कहने लगी कि ऐसा लग रहा था कि तुम जन्मजात ईसाई हो, मैंने हंसते हुए कहा कि हर अनुभव को अन्तर्लीन करना यात्रा का उद्देश्य होता है, और सान्त्र्यागो आकर बिना सन्त से मिले जाना ठीक नहीं होता ना।

धार्मिक नगरी करीब करीब एक सी होती है, तीर्थयात्री, सामान बेचने वाले और भिखारी, हाँ यहाँ पर भी कुछ भिखारी थे, लेकिन वे कहा जाता है कि रोमानिया से आये हुए थे. लेकिन हमारे देश की तुलना में बहुत कम थे


बेहद यादगार दिन गुजरा, एक खूबसूरत कवि के साथ, एक खूबसूरत प्राचीन नगरी की यात्रा , लौटते वक्त हम दोनों चुप थे, मुझे आश्चर्य हो रहा था कि योलण्डा किस तरह गाड़ी चला रही थी, क्यों कि मैं झूमने लगी थी। योलण्डा ने मुझे बिल्कुल रोका टोका नहीं। लौटते वक्त वह मुझे रेलवे स्टेशन लेकरआई, क्यों कि मुझे नौ तारीख को अलारिज जाना था,जहाँ मेरी दूसरा कविता पाठ था।

रास्ते में लौटते वक्त योलाण्डा ने मुझे रेलवे स्टेशन जाना था, क्योंकि मुझे अकरुना के कविता पाठ के दूसरे दिन आरेंस नगर में पाठ के लिए जाना था। योलाण्डा को उसी दिन अन्य नगर में जाना था, इसलिए मुझे अपने जाने का इंतजाम स्वयं करना था। समस्या केवल भाषा की थी, अन्यथा उन्होंने मेरे लिए टैक्सी और टिकिट आदि का इंतजाम कर दिया था, योलाण्डा मुझे रेलवे स्टेशन लेजाकर समझाने लगी  किस तरह से मैं किस नम्बर की गाड़ी में बैठू, और कहाँपर उतरू, फिर स्टेशन की काफी शाप में आयोजक का इंतजार करूँ।

अभी सांझ नही हुई थी, मैं होटल पहुँच गई, शाम को गेलेसिया के सांस्कृतिक केन्द्र् , जहाँ मेरा कविता पाठ भी होना था, वहीं आज एक दक्षिण भारतीय युवक की नृत्य प्रस्तुति थी। योलाण्डा ने कहा कि मैं आराम कर के फ्रेश हो जाऊं, वह मुझे लेने आएगी।

शाम को जब हम सांस्कृतिक केन्द्र पहुँच गए,योलाण्डा ने बताया कि यूरोप के अभिजात्य वर्ग में ओपरा का चलन होता है। अभीजात्य वर्ग अधिकतर डाउन टाउन से दूर रहते हैं, लेकिन गेलेसियन सरकार ने सांस्कतिक भवन डाउन टाउन में बनाया, जिससे निम्न और मध्यम वर्ग भी सांस्कृतिक चेतना से लाभान्वित हों। ये विशालकाय भवन है, जिसमें हाबी क्लासों से लेकर काफी हाउस, आर्ट गैलरी थियेटर आदि का इंतजाम होता है। यह भवन पूरी तरह से आधुनिक तकनिक से लैस है।  इतना सुन्दर सांस्कृतिक केन्द्र टाउन हाल में होने पर अभिजात्य वर्ग भी आपेरा के आनन्द के लिए यहाँ आने लगा, इस तरह सांस्कृतिक समन्वय क साथ सामाजिक समन्वय भी संभव हो पाया। यही केन्द्र हर तीसे महिने एक विदेशी और एक देशी कवि की काव्य गोष्ठी आयोजित करता है, जिसकी इन्चार्ज योलाण्डा थी, क्यों कि वे स्वयं अन्तर्राष्ट्रीय कवि के ख्याति अर्जित कर चुकी हैं, और अनेकों से परिचित हैं।


शाम को चैन्नई के कलाकार का नृत्य के लिए दर्शकों की संख्या बहुत अच्छी नहीं थी, शायद उस दिन धूप ज्यादा खिली थी, फिर भी जितने लोग थे, सभी ने आनन्द लिया। रात के खाने में हम सब साथ थे, नर्तक शाकाहारी भोजन ही चाहते थे, और यूोप में शाकाहारी भोजन महंगा होता है, योलाण्डा खुश थी कि हर तरह का भौजन करने को तैयार रहती हूँ, यही नहीं मैं, भोजन का चुनाव भी होस्ट पर छोड़ देती हूँ।

शाम को चैन्नई के कलाकार का नृत्य के लिए दर्शकों की संख्या बहुत अच्छी नहीं थी, शायद उस दिन धूप ज्यादा खिली थी, फिर भी जितने लोग थे, सभी ने आनन्द लिया। रात के खाने में हम सब साथ थे, नर्तक शाकाहारी भोजन ही चाहते थे, और यूोप में शाकाहारी भोजन महंगा होता है, योलाण्डा खुश थी कि हर तरह का भोजन करने को तैयार रहती हूँ, यही नहीं मैं, भोजन का चुनाव भी होस्ट पर छोड़ देती हूँ।


दूसरे दिन कविता पाठ शाम को था, इसलिए मैं सुबह सवेरे घूमने निकल गई, लेकिन दुपहर से पहले कमरे में वापिस आकर पाठ की तैयारी करने लगी।
 मुझ से योलाण्डा नें अनेक कविताये मंगवाई गई थी, मैंने वे कविताए छाँट कर दी, जिनके अनुवाद अग्रेजी और स्पेनिश दोनो भाषाओं में था। क्यों कि गेलेसियन भाषा पुर्तगाली भाषा से तो बहुत मिलती है, लेकिन स्पेनिश से भी संवाद रख लेती है। कविता चुनाव का काम योलाण्डा पर छोड़ दिया जिन्हें अनुवाद करना था। यूरोपीय देशों में हर प्रमुख कवि अच्छा अनुवादक भी होता है, क्यों कि यहाँ अनुवाद को विशेष महत्व दिया जाता है, और कभी कभी कवि की आय का यही साधन ही होता है।
मुझे आश्चर्य हुआ योलण्डा के दो चुनावों पर, एक कविता थी, पूर्वज और हम, जिसे मैंने बीस साल पहले लिखा था, साधारण सी कविता, साधारण सी शैली, ना घुमाव फिराव, बस अपने में पूर्वज खोजने की कोशिश, साथ ही उन्होंने मेरी चदरिया और देहान्तर नामक कविता को भी चुना, जिसमें भारतीय दर्शन जरा अजीब से भाव मे आया है, मेरी चदरिया, कबीर की चदरिया के जवाब में अध्यात्म की जमीनी हकीकत का बयान था, और देहान्तर भी दर्शन से उतर से जिन्दगी के हिस्से हिस्से पर उतर कर आई थी।
मेरी कुछ कविताएं, जिन्हे मैं अच्छा मानती थी, उस चुनाव प्रक्रिया में नहीं आई,।
मैं इतना ही समझ सकी कि कविता की भावना किसी भी भाषा या क्षेत्र में कुछ ना कुछ समानता रखती है, वैचारिक प्रक्रिया कहीं कहीं जुड़ती है, और जब ये जुड़ाव होता है तभी सम्प्रेषणीयता स्थान लेती है।
कविता की वैश्विकता सम्प्रेषण की एकाग्रता है, कहे तो गलत नहीं होगा....
शाम से पहले मैं तैयार थी , शाम को योलाण्डा आई, वे बला की खूबसूरत लग रही थी, अन्य कवि हेलेना भी अपने पति के साथ उपस्थित थी, होटल में हमारी शाम की चाय थी। योलाण्डा ने हर काम बहुत तारतम्य से कर रखा था। वे बेहद मजबूत तैयारी करती हैं। हेलेन अंग्रेजी नहीं जानती थी, लेकिन उनकी किताब बेहद खूबसूरत थी, जो चादर की तरह बिछ सकती थी।

शाम को हम सांस्कृतिक केन्द्र पहुँचे,  स्टेज, हाल आदि बेहद ही अच्छी तरह से सजा रखा था। साउण्ड सिस्टम बेहतरिन था। हम लोग तीस चालीस श्रोताओं की कल्पना कर रहे थे, लेकिन करीब सत्तर लोग हाल में उपस्थित हुए तो योलाण्डा बेहद खुश हो गई । हेलेन की पाठकीयता अच्छी थी, इसलिए बहुत से लोग उनके व्यक्तिगत परिचय से भी आये होंगे। पाठ बहुत अच्छी तरह से चला, बिल्कुल रिकार्डिंग सा, जिसमें एक भी टेक नहीं लिया गया हो। मुझे पता चला कि पूरा पाठ केन्द्र के बाहर की दीवार पर जगहजगह दिखाया गया था। वैसे भी उस दिन केन्द्र में हम दोनों की तस्वीरे सभी पर्दों पर दिखाई जा रही थी, पोस्टर ही नहीं पानी की बोतलों तक में हमारी तस्वीरे थी।
मेरी कुछ कविताओं को अच्छा रिस्पांस मिला, उसमें एक थी, मेरी चदरिया, आश्चर्य यह कि यह कविता मैं कबीर की चदरिया पर सवाल उठाते लिखी थी, और मेरा सोचना था कि पृष्ठभूमि ना जानने के कारण यूरोप में समझने में दिक्कत होगी, लेकिन अधिकतर लोगों ने अपने अपने तरीके से इससे अपने को कनेक्ट किया।

वीडियों बनाने वाली कलाकार ने मुझे अपने चित्रकार पति का चित्र दिखाया जिसमें चार स्त्रियाँ एक चादर बुन रही हैं, कविता की रचना प्रक्रिया कुछ भी हो, लेकिन सम्प्रेषण प्रक्रिया भी महत्व रखती है।
कवियों को जो स्नेह यूरोप में दिया जाता है, वैसा कहीं भी नहीं दिया जाता है।

रात का भोजन में मैं हेलेन, योलान्डा और हेलन के पति थे, मुझे हेलेन के पत ने बताया कि उन्होंने भी एक कविता पूर्वजों पर लिखी थी, और मेरी कविता सुन कर वे अच्छी तरह से कनेक्टकर सके... सच है कि कवि  की संवेदना भाषा या स्थान की मुहताज नहीं होती है।



रात का भोजन में मैं हेलेन, योलान्डा और हेलन के पति थे, मुझे हेलेन के पत ने बताया कि उन्होंने भी एक कविता पूर्वजों पर लिखी थी, और मेरी कविता सुन कर वे अच्छी तरह से कनेक्टकर सके... सच है कि कवि  की संवेदना भाषा या स्थान की मुहताज नहीं होती है।

काव्यपाठ के अगले दिन ही मुझे अलारिज,  के लिए रवाना होना था,योलाण्डा को दो दिन के लिए बाहर जाना था,निश्चय यह हुआ कि मेरे लिए सुबह आठ बजे के आसपास टैक्सी आ जायेगी, और मैं नौ बजे की ट्रेन लेकर अलारिज पहुँच जाऊंगी, जहाँ पर लुइस मिलेंगे।

मैं पहले रोम आदि में रेल की यात्रा कर चुकी हूँ, इसलिये परेशान नहीं थी। यहाँ समस्या बस भाषा की थी, लेकिन मुझे बताया गया कि खास स्टेशनों के नाम अंग्रेजी में भी बताये जाते हैं।

यूरोप में रेल बहुत साफ और सुन्दर होती हैं, इस रेल में तीर्थयात्री भी दिखाई दे रहे थे, जो सान्त्रायगो से लौट रहे थे। नदी, पहाड़, झरने और विशाल चारागाह, खिड़की से यह सब दिखाई दे तो क्या चाहिये।
दो घण्टे में मैं औरेन्स के नर  अलारिज पहुँच गई थी, और योलाण्डा द्वारा बताये गये काफी हाउस में बैठ गई। योलाण्डा ने मुझे कहा था कि एक काफी का आर्डर देकर वाइ फाइ का पासवर्ड मांग लेना, जिससे लुइस को अपने आने कीसूचना दे सकूं।

थोड़ी देर में लुइस हाजिर थे, हंसमुख , बच्चे सी चपलता, उन्होंने मेरा बैग उठाया, और चलनेको इशारा किया। लुइस शायद एक शब्द भी अंग्रेजी का नहीं बोल पाते थे।हम लोग एक खास जगह तक कार में पहुंचे, फिर लुइस ने मेरा बैग पकड़ कर पीछे आने का इशारा किया। मैं इस नगर को देख कर दंग थी, यहाँ गाड़ी भीतर नहीं जा सकती थी, साइिल या पैदल ही भीतर जाया जा  सकता था, पूरा नगर पतली पतली गलियों से घिरा था, जो छोटे छोटे चौकों से जुड़ा था।नगर के बीचों बीच गरम पानी की नहर निकलती थी,जिसके किारे एक प्राचीनकालीन स्पा था, साथ ही नया स्पा भी था। लुइस कुछ ना कुछ बोलते जा रहे हैं, और मैं सिर हिलाती जा रही थी, लेकिन भाषा की जगह आँखों का इस्तेमाल ज्यादा कर रही थी। मैंने नल खोल कर हाथ पानी के नीचे रखा तो खौलते पानी से मेरा हाथ जलते जलते बचा।

इस तरह रास्ते की इमारते घर, आदी देखते चौकों के बाद चौक पार करते हम एक छोटे से घर में जा पहुँचे, जो होटल था,जिसमें मेरे लिए कोने का एक बेहद छोटा कमरा बुक किया गया था। कमरे में बस एक बैड और एक मेज थी, खिड़की गली में खुलती थी। साफ सुथरा बाथरूम था।
मेरा सामान होटल में रख कर लुइस मुझे खाना खिलाने ले आये, और मेरी खाने की आदत के बारे में पूछा, तो मैंने कहा कि जो चीज यहाँ सबसे ज्यादा पसन्द की जाती हो, वही खाना है।
वे एक होटल में गए, जहाँ हमने लोकर ब्रेड के साथ सब्जी खाई।
वापिस होटल में छोड़ कर लुइस चले गये, और कहा कि मैं शाम को चार बजे तक तैयार रहूँ। लुइस विन्सेन्ट के नाम पर संस्था चलाते हैं, जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होत हैं। Vicente Martínez Risco Agüero (October 1, 1884,- April 30, 1963, Ourense)ओरेन्स नगर के बौद्धिक महान हस्ती थे। उन्होंने Xeración Nós, नामक सााहित्यक संस्था की स्थापना की। गैलेसियन भाषा के साथ साथ ये स्पेनिश उपन्यास और आलोचना कला के भी पिता भी माने जाते हैं। आपने गैलेसियन भाषा के उद्धार के लिये बहुत परिश्रम किया। मुझे बताया गया कि विन्सेन्ट भारतीय संस्कृति से प्रभावित थे, और भारत आना भी चाहते थे, लेकिन वह वक्त अलग था़ , वे पहले रवीन्द्र नाथ टैगोर के प्रशंसक थे, लेकिन यूरोप के ही किसी प्रान्त में जब उनसे मिले तो प्रभाव कम हो गया, उन्हें लगा कि रवीन्द्र नाथ का समाजवाद किताबीय है, जबकि गांधी का समाज पक्षीय है, वे तभी से गांधी के अनुयायी बन गये, हालांकि उन्हें गांधी जी से मिलने का मौका कभी नहीं मिला,,,

आज भी उनके नाम पर चलने वाली संस्था भारतीय कलाकारों या साहित्यकारों को साल में एक दो बार जरूर आमन्त्रित करती हैंविन्सेन्ट के भारत प्रेम के प्रतीक के रूप में,,,,,,

मेरे लिए ऐसे महान जन के कार्यक्रम में भाग लेने से ज्यादा क्या महत्वपूर्ण होता।
मैने एक शावर लिया और कविताओं का जत्था निकाल लिया। शाम को वे अपनी पत्नी के साथ हाजिर थे। लुइस की पत्नी ज्यादा व्यवहारिक लगी।

हम लोग पुनः गलियों गलियों निकलते हुए शहर को पहचानने की कोशिश करने लगे।

अलारिज शहर नदी के किनारे बसा है, इसलिए जब रोमन साम्राज्य का विकास हो रहा था, तो यह गुपचुपा सा प्रान्त भी  चपेट में आया। नदी का प्रयोग सेना के यातायात के लिए उपयुक्त था। रोमन सेना के नदी के किनारे अस्तबल और चमड़े के कारखाने खुल गये। और गरम स्रोत सैनिकों के आरामगाह बन गये, लेकिन इस छोटे से प्रान्त का चेहरा मोहरा नहीं बदला, सिवाय इसके कि हर तरफ चर्च थे।

लुइस मुझे एक अस्तबल ले जाते हैं, जहाँ घोड़े रखे जाते थे, आज वह चमड़े का व्यापारिक केन्द्र है। नदी बेहद खूबसूरत, और उस पर बने अर्धचनद्राकार पुल तो बहुत ही सुन्दर, जिनकी परछाई जल पर इस तरह पड़ रही थी कि वे पूर्ण चन्द्राकार लग रहे थे।

लुइस की पत्नी अना अभिव्यक्ति में बेहतर थी, बिना बोले ही काफी कुछ समझादेती थी। रास्ते में हम एक बेकरी पर रुके, जहाँ मेरे चित्र वाला पोस्टर लगा हुआ था। हम लोगो ने आइसक्रीम खाई, फिर चल दिए, अब हम एक ऐसी जगह पहुँचे जो कभी अस्तबल हुआ करता था, लेकिन ज उस पर रेस्तोरेन्ट खुला है, अस्तबल की किसि भी निशानी को मिटाये बिना उसे बड़ी सुन्दरता से रैस्टोरेन्ट का रूप दे दिया गया था।

रास्ते में अना ने मुझे एक विशालकाय ननरी दिखाई, जो किसी जेल से कम नहीं थी। कहा जाता है कि जो पुरुष अपनी पत्नी से नाराज होते या पसन्द नहीं करते, वे पत्नी को यहाँ छोड़ कर चले जाते। ननरी के भीतर क्या होता, कोई नहीं जानता। क्यों कि एक बार भीतर जाने के बाद कोई उन्हें देख नहीं सकता था। यदि घर का कोई जन उपहार लेकर आये तो उसे एक खास तरह की खिड़की से सामान देना होता था, जो घूमती थी, जिससे भीतर बैठे जन की परछाई भी ना दिखे।

ननरी किस तरह का जेलखाना थी, इस पर रिसर्च होनी चाहिये, लेकिन धर्म के छत्ते पर कौन हाथ डाले।

अलारिज में बैलों का महत्व रहा है, यहाँ बुल फाइट प्रचलित रही है, यह स्पेन का प्रमुख केल रहा है, इसलिए हम जगह जगह बैलों की आकृति को देख सकते हैं।

पतली पतली गलियों से निकल कर जब हम Vicente Martínez Risco के भवन पहुँचे तो देखा कि लुइस , जो हमसे कुछ पहले पहुँच चुके थे, खून से लथपथ थे, और बाहर किसी डाक्टर के पास जा रहे थे, पता चला की अन्धरे में उनका सिर किसी कांच से टकरा गया और खून बहने लगा। अना उन्हे लेकर भागी।

मेरा मन भी उदास हो गया था , लेकिन मैंने अपना मन विन्सेन्ट के पुस्तकालय आदि को देखने में लगाया, कुछ देर बाद लोग आने शुरु हो गय॓। मैं लुइस के बारे में सोच ही रही थी, कि वे और अना ते दिखाई दिये। लुइस किसी बच्चे की तरह चपल थे।

काव्य पाठ अच्छी तरह से चला, लुइस दर्द भूल कर फिल्म बनाते रहे। कमरा तंग था, लेकिन लोगों में उत्साह था।

पाठ के बाद स्थानीय पुडिंग के और वाइन की पार्टी थी, देर रात को मुझे होटल में पहुँचा कर अना और लुइस घर चले गए। और बताया कि वे दुपहर में लेने, आयेंगे। योलाण्डा नबताया था कि में अलारज मं दो दिन रहूँगी, लेकिन लुइस को अ करुना में कोई काम था, इसलिये अगले दिन ही लौटना था।

दूसरे दिन मुझे करीब के होटल में नाश्ता करना था, जो वहाँ काखास नाश्ता कहलाता था, वह था, चाकलेट ड्रिक।

मैंने देखा कि वहाँ एक बेहद बूढ़े व्यक्ति बैठे हैं, मालूम पड़ा कि होटल वाला उन्हे रोजाना मुफ्त में चाकलेट ड्रिंक देता है, जिसे वे आराम से पीकर जाते हैं।



वापिस आने पर होटल वाले ने मुझे कमरा खाली करने को कहा, तो समझ नहीं आया कि क्या करूं, क्यों कि वापिस लौटने का विचार शाम का था, तो क्या किया जाये। लेकिन कुछ देर में अना आ गई, मैंने तब तक अपना सामान लगा लिया था, अब अपना बेग होटल में छोड़ कर हम दोनों फिर से नगर प्रदक्षिणा को चल दिये, वे ही पतली गलियां, वे गरम सोते, सर्च , हवेलियाँ चौक। अना को हर कदम में जान पहचानवाला मिल जाता। मुझे लगा कि कितना अच्छा होता है इस तरह के शहर में रहना,,,, सब अपने ही लगते हैं। यदि मैं इस शहर में एक महिना भी रह लूँ , तो आसानी  इसे अपना बना सकती हूँ...

हमारी वापसी यात्रा कार से थी. अकरुना में मुझे उस होटल में टिका दिया गया, जिसमें मेरा फिर से
रिजर्वेशन किया गया था। यह एक छोटा सा होटल था, जिसे एक परिवार चला रहा था। माँ खाना बनाती, बेटा मेनेजमेन्ट देखने के साथ सफाई आदि भी करता। यूरोप में ऐसे होटल अच्छा लाभ कमाते हैं।


अब मैं बिल्कुल अकेली थी, हालांकि में खास ट्यूरिस्ट सेन्टर में थी, इसलिये सब कुछ पैदल चलने की परिधी में था। मैंने बस यूं ही चलना शुरु कर दिया। सबसे पहले मैंने समन्दर तट के किनारे चलना शुरु किया, जहाँ विशाल बगीचा था, और बन्दरगाह था। जिसके अन्त में एक पराचीन किला था. जिसके बारे में कहा जाता है कि यह अ करुना की प्राचीनतक इमारत है। किले तक पहुंच कर पता चला कि भीतर जाने का वक्त पूरा हो गया, तो मैं आसपास घूमने लगी। घूमते घूमते मुझे कई छोटे छोटे संग्राहलय मिलें, जहाँ पर गैलेसियन साहित्यकारों का साहित्य था। मैं पढ़ तो कुछ नहीं सकती थी, लेकिन चित्र देख कर लौटती गई। मैंने देखा कि इ नगरों में चौकों का खास महत्व होता है, एक चौक दूसरे से कहीं ना कहीं जुड़ता है, बगीचे भी इन नगरों की पहचान हैं।

मैंने एक बेहद बूढ़ी महिला को फलों की छकड़ा गाड़ी लेकर जाते देखा, लौटते वक्त उस पर ब्रेड
 थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि यहाँ उम्र श्रम के महत्व को नहीं नकारती है।

अकरुना में रात कब होती है, पता ही नहीं चलता, क्यों कि चौक हमेशा आदाब रहते हैं, खाने के आउटलेट चमकते रहते हैं, लोग आते जाते रहते हैं। अच्छी बात यह है कि यहाँ गलियों के भीतर गाड़िया नहीं ले जाई जा सकति, हर जगह पैदल ही घूमा जाता है। इसलिए समस्या नहीं होती।
मेरी खासी परेशानी खाने को लेकर थी, क्योंकि किसी भी रेस्टोरेन्ट में अंग्रेजी नहीं बोली जाती, मैन्यू कार्ड भी गेलेसियन भाषा में होता है, अतः मैं ऐसे स्थान में गई, जहाँ सैन्डविच दिखाई दे रहा था।

रात को मैंने निश्चय किया कि एक और दिन है मेरे पास, तो मैं तारतम्य से घूमूंगी।
दूसरे दिन मैं सुबह सवेरे नहा धोकर बाहर निकल गई, नाश्ता होटल में था,
पास में एक झौला, एक डायरी और एक कलम, साथ में मेरा कैमरा।
बूढ़ा किला मेरी लिस्ट में सबसे पहले था--

मूझे बूढ़े किले से मिलने जाना है
और यह जाना मुझे भा नहीं रहा
शायद इसलिये कि मैं इन किलों में
बंधी जंजीरों से बतिया चुकी हूँ
या फिर इसलिये कि इनकी प्राचीरें
मुझे सहज होने से रोकती हैं
लेकिन यह बूढ़ा किला है
जिसकी दीवारों पर लगी काई
पत्थरों से कहीं ज्यादा मजबूत है
मुझे झिझकता देख, उन्होंने बताया
कि ये अब किला नहीं हैं
किले से पिंजरे तक होती हुई इसकी
आत्मा बस भग्नावेश संजो रही है
जिन्होंने भी किले देखे हैं, वे जानते हैं कि
इनके भीतर क्या होता है
कुछ पत्थरी प्राचीरें, कुछ तंग खिड़कियाँ
कुछ गलियारे, कुछ गुम्बदे,
दुश्मन को खोजती पत्थरी आँखें
विश्वास से कुछ ज्यादा अविश्वास
फिर रहस्यमयी सुंरग, चतुर
राजनयिक के बचाव के लिये
जिन्होंने भी किलों का इतिहास पढ़ा
वे जानते हैं कि किले
अधिकतर पराजित होते हैं
या तो गिराये जाते हैं, या फिर खुद
ढ़ल जाते हैं, मिट्टी में धीमे धीमे
फिर भी लोग किलों को देखते हैं
मेरे पास अब किला ना देखने की कोई बजह ही नहीं है

*

अब तक मुझे रा्ते याद हो गए थे, सबसे पहले मैं  समुद्र तट पर बनते शापिंग सेन्टर की ओर गई, इसके बाहर ही एक मेला सा लगा था, जिसमें मूर्तिकला से लेकर तमाम कार्यकलाप हो रह थे। अ करुना जितनी तेजी से ट्युरिस्ट सेन्टर बनता जा रहा है, उनी तेजी से व्यापारिक केन्द्र बनना भी जरूरी है। जब से जहाजीय यात्राओं का चलन हुआ है, इस तरह के बन्दरगाह नगर महत्वपूर्ण हो गए है। तरह तरह की कलाकृतियां देखते , फोटो खींचते में शापिंग सेन्टर के भीतर जाती हूँ। वहाँ पर मैं एक दो हेन्ड बैग खरीदती हूँ। बाहर निकलती हूँ कि देखती हूँ कि एक संगीत टोली पूरी सज धज के साथ बन्दरगाह की ओर जा रही है।
जब से जहाज की यात्राएं जिसे क्रूस ट्यूरिज्म भी कहते हैं , शुरु हुआ है, तब से पुारी रीतियों को मनोरंजक तरीके से चालू कर दिया गया। पुराने जमाने में जब जहाज यात्रा करके आता होगा , तब उसके स्वागत सत्कार के लिए अनेक कार्यक्रम हुआ करते होंगे। उनमें से एक यह संगीतमय स्वागत भी रहा होगा।

सारे कलाकार तरीके से खड़े होकर वाद्य बजाने लगते है. दर्शकों में भी बहुत से लोग हैं, जो आनन्द ले रहे हैँ। तभी क्रूस किनारे आने लगा, और संगीतज्ञ टौली खासी उत्साहोत हो गई। क्रूस में लोग दरवाजे पर खड़े होकर आनन्द ले रहे थे, और इधर भी लोगों का हुजूम था, ऐसा लग रहा था कि कोई अपना ही परदेस से लौटा है, जिसकी खुशी मनाई जा रही है, जब कि असलियत ना संगीत था, ना अपने के लौटने की खुशी, बल्कि घर में चूल्हा जलने की जुगत।–

उनके काले कोटों पर लगे झूठे तमगे
उन्हीं की तरह झमक उठते हैं
जब अनजाने पाहूनो की
महक उन तक पहुँचती है
वे संभाल लेते हैं साज, और सजा
लेते हैं सुर , जहाज के आने से पहले
बिछा देते हैं सुरों का गलियारा
वे थामते हैं अनजाने हाथ, धुनों पर
फिसलने को, खोलते हैं ढपली का पेट
अपने बच्चों का पेट छिपाने को
जमीन से छुलने से पहले
पहुँचा देते हैं गमक सी मींड़,
कदमों की थापों के साथ
जहाज की छत तक,
नाचते हैं, थिरकते हैं, मानों कि
कोई सगा लौट रहा हो
बरसों के प्रवास के बाद,
गले मिलते हैं अनजानों से
कि अपने भी ना मिल पायें
जिस अनजाने पाहुने आते हैं
स्ट्रीट सिंगर के घरों की चिमनी
मछली की गमक को उगलती है
रात बिना साज के ही
गुनगाने लगती हैं

मैं आगे चलने लगी, पुराने किले पर भी पहुँची, और फिर Tower of Hercules जा पहुँची। टिकिट लेकर भीतर पहुंची तो महसूस हुआ कि सदियों का इतहास जमीन पर लेटा है। धूप तेज हो चली थी, समन्दर के किनारे की धूप हमेशा कड़क होती है, मुझे अचानक याद आया कि यदि साड़ी पहनी होती तो पल्लू सिर पर रख लेती,,,
jhatpati kavita


बहुत याद आया मुझे आज
मेरी साड़ी का पल्लू
जिसे कभी भी कमर पर खोंच कर
मैं युद्ध की सूचना दे सकती थी
जिसका सिर पर रहना
मेरी तमीज की पताका होती थी

वही पल्लू,
जिसने मुझे कभी घाम से बचाया
कभी मेरे दागों को पौंछा
और कभी मेरे पसीने को सुखाया

यह वह था, जो बच्चों से
संवाद की डोर था,
जिसमें जिन्दगी की चाभी
लटका करती थी

वही पल्लू , जो मेरे कदमों में
उलझा, जरा बहुत रूठा
फिर जा बैठा पुरानी
बन्द रहने वाली अलमारी में

विदेशी तपन की तीखी बरछी से
कौन बचा सकता है मुझे
मेरी देसी साड़ी के पल्लू के सिवाय

हर काल और शासन के आयुध,,, अन्ततः प्रचीन नाव के नमूने, तट रक्षक,,,, कुछ चीजें सिर्फ महसूस करने के लिए होती है, अजीब सी मिली जुली सी गंध, प्राचीनता में समन्दर की ताजगी की गन्ध, समन्दर को ताजगी कौन देता होगा, वह तो धरती से भी पुरातन है, संभवतया उस उड़ते पंछियों के पंख , या फिर भीतर घर संसार सजाये बैठी मछलियाँ,,,,

बस इसी तरह भटकती भटकती में अकरुना को महसूस करने लगी, इतना कि कभी भी इस नगर को सोचूं तो मेरे भीतर नगर चमक उठे।

शाम को योलाण्डा वापिस आने वाली थी, और लुइस हमें चर्च में होने वाली एक संगीत सभा में ले जाने वाले थे, जहाँ पर पुर्तगाली गायकों का सम्मेलन था।

संगीत के शब्द नहीं होते, भाव भी नहीं, मात्र ध्वनि लहरियाँ जिन्हें बेहद भीतर , सुषुम्ना नाड़ी के भितर महसूस करना होता है।

रात को फिर सह भोजन

दूसरे दिन सुबह योलाण्डा मुझे विदा देने के लिए तैयार थी,

मैं वापिस लौट रही थी,

यात्रा से पहले जितनी समस्याएं आई थीं, यात्रा के दौरान उतना ही आनन्द

Tuesday, January 10, 2017

झील और बन्धनों का टूटना ...

 बस इतना ही करना है
किसी नए शहर में पैठने के लिए,
कोई नई गली पकड़ कर
कोई पगडन्डी की राह थाम,
खरामा खरामा चल देना है

करना इतना ही है कि
गन्तव्य को भूल कर
गलियों के मोड़ों के साथ
घूमते जाना है

रास्ते में उग आई
हर पदचाप को परखना है
हर पात से बात करना है
पतझड़ के रंगं को
भीतर तक उतरने देना है

जब तक कि हरे पीले रंगों को भूल
लाल भूरे रंग ना
ना अंग लगा ले तुम्हें

बस इतना ही करना है कि
हर नुक्कड़, हर छोटी सी दूकान से
उसकी कहानी सुन लेना है
ना जाने कब कोई घुसपैठिया
उनमें पैठ कर ले
और हम रंगो को ही स्वाद समझ लें

करना इतना भी है कि
किसी ट्राम में बैठ, उसके आखिरी
स्टेशन तक चलने का मन मनाना है
फिर आखिरी से एक पहले स्टेशन पर उतर कर
हवा को घूँट घूँट पीते हुए
किसी गलत बस को पकड़
शहर का चक्कर लगाते हुए
लौट आना है

इतना ही तो करना है
एक नये शहर को किसी गीली
ठण्डक में शाल सा ओढ़ने के लिए

भ्रमण के हिज्जों को याद करने के लिए


इस झील और बन्धनों का टूटना झील और बन्धनों का टूटना बीच चीन की यात्रा कर के वापिस लौट आई, कुछ दिनों तक पूरी तरह कमरे में ही बन्द रही, क्यों कि अपने प्रोजेक्ट से समन्धित विचारों को एक रूप रेखा देनी थी, इस बीच बस कभी कदार  झील तक उतर कर जाती और चहलकदमी करती या फिर समान लेने स्टोर में। मैंने देखा कि विचारों को सहेजने के लिए कागज के टुकड़े ज्यादा  कारगार होते हैं, क्यों कि तब ना तो उन्हें सेव करने की चिन्ता होती है, और  ना तारतम्य में लिखने की।  ये नोट पेपर आराम से नोटिस बोर्ड पर चिपका दिए जा सकते हैं। इस बीच बस इतना हुआ कि मेरे बगल में रहने वाले स्पेनिश कलाकार, जो अंग्रेजी के प्रोफेसर भी दो चार बार मिलने आये, और मेरी कविताओं के अंग्रेजी में अनुवाद पर चर्चा करते रहे। फिर उन्होंने जाने से पहले एक छोटा सा कविता पाठ सा रखा, जिसमें केवल हम चार कलाकार, जो विला में रह रहे थे, शामिल हुए, साथ ही एडुवर्ड की खूबसूरत पत्नी और दो बच्चे।
एडुवर्ड को मेरी कविता ड़िफ्यूजी इतनी पसन्द आई कि उन्होंने अपने थियेटर में उसका प्रयोग  करने की परमिशन भी मांगी, मेरे लिए तो खुशी की ही बात थी।

पिछले दिनों में मेरे प्रोजेक्ट की रेखाएँ स्पष्ट होने लगी थी, तो मन में एक विश्वास भी आया।
अभि तक मैंने  ट्रेन का टिकिट नहीं बनवाया था, और मेर घूमना आस पास पैदल ही होता था। लेकिन अब मैंने अगुस्ता की मदद से ट्रेन का मासिक पास खरीद लिया, और स्थानीय नियमों को भी जान लिया। अगुस्ता को छोड़ने के लिए मैं ट्रेन से गई, जिससे एक झिझक मिट जाये।


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पांवों में बन्धन हम खुद बान्धते हैं,  उनके खुलने पर भी दौड़ना शुरु नहीं करते, क्यों का बन्धन का अहसास ही तब असली बन्धन बन जाता है़ , अब मैंने दूसरे दिन से नियम बना लिया कि सुबह उठते ही लिखने पढ़ने बैठ जाती, और करीब तीन बजे के आसपास नहाना धोना शुरु करती और चार बजे घर से निकल जाती, फिर जो ट्रेन आती उसे पकड़ सबसे पहलेस्टानबर्ग स्टेशन चलि जाती।

विस्तार में फैली झील, अलग अलग तट, कहीं महिलाएं धूप स्नान कर रही है, कहीं बतकें तट पर आकर दर्शकों का मन बहला कर भोजन कमा रही हैं, तो कहीं जहाज से लोग उतर रहे हैं, उन दिनों अच्छी धूप थी, और धूप में पूरा जर्मनी बाहर निकल पड़ता हैं। मैं घन्टों टहलती रही, और फिर ट्रेन पकड़ कर लौट आई। यूरोप में उम्र की कोई बाधा नहीं, मैंने ना जाने कितने वृद्धों को अकेले या मित्रों के साथ झील के किनारे देखा, यहाँ अकेले घूमना भी सवाल नहीं खड़े करता है।  मुझे लगा कि हमारे देश में हम अपने आसपास ना जाने कितने बन्धन बाँढ़ लेते हैं। केरल में तो मैं घर से बाहर यदि पैदल निकल गई तो दो चार महिलाएं रोक कर पूछ ही लेती हैं, कि कहाँ जा रही हूँ, या कहाँ से आ रही हूं। मानो की मेरे आने जाने का सम्बन्ध उनके अपने जीवन से भी जुड़ा हो। अधिकतर ये महिलाएँ घरेलू सहायिकाएं होती हैं, लेकिन इस तरह के सवाल मात्र उनके संवाद में सहायक भूमिका निभाने के लिए होते हैं।

जल को जीवन कहना संभवतया इसलिये भी उचित होता है कि इसके समीप आते ही हम एक अलग ताजगी पाते हैं। जल में बच्चे सी खिलखिलाहट होती है, हलचल होती है, जल से जीवन है, यह विचार यूँ ही तो नहीं आया।

अब मैंने धीरे धीरे आगे के स्टेशनो पर जाना शुरु किया। गूगल सर्च करके, म्यूजिमों का पता नोट किया, और  उनकी यात्रा पर भी चलने लगी।

यहाँ इतवार को म्यूजम में एन्ट्री फीस केवल एक यूरों होती है तो सबसे पहले रविवार कौ ही म्यूजम गई। सबसे पहली यात्रा  Pinakothek der Moderne की थी, जिसके बारे में आगे आराम से चर्चा करूंगी, क्यों कि म्यूजिम को देखना एक अलग अनुभव होता है।

झील का वह स्टेशन दिखाई दिया, जहाँ झील का पूरा आनन्द लिया जा सकता है।
पांवों में बन्ढ़न हम खुद बान्धते हैं,  उनके खुलने पर भी दौड़ना शुरु नहीं करते, क्यों का बन्धन का अहसास ही तब असली बन्धन बन जाता है़ , अब मैंने दूसरे दिन से नियम बना लिया कि सुबह उठते ही लिखने पढ़ने बैठ जाती, और करीब तीन बजे के आसपास नहाना धोना शुरु करती और चार बजे घर से निकल जाती, फिर जो ट्रेन आती उसे पकड़ सबसे पहले स्टानबर्ग स्टेशन चली जाती।

विस्तार में फैली झील, अलग अलग तट, कहीं महिलाएं धूप स्नान कर रही है, कहीं बतकें तट पर आकर दर्शकों का मन बहला कर भोजन कमा रही हैं, तो कहीं जहाज से लोग उतर रहे हैं, उन दिनों अच्छी धूप थी, और धूप में पूरा जर्मनी बाहर निकल पड़ता हैं। मैं घन्टों टहलती रही, और फिर ट्रेन पकड़ कर लौट आई। यूरोप में उम्र की कोई बाधा नहीं, मैंने ना जाने कितने वृद्धों को अकेले या मित्रों के साथ झील के किनारे देखा, यहाँ अकेले घूमना भी सवाल नहीं खड़े करता है।  मुझे लगा कि हमारे देश में हम अपने आसपास ना जाने कितने बन्धन बाँढ़ लेते हैं। केरल में तो मैं घर से बाहर यदि पैदल निकल गई तो दो चार महिलाएं रोक कर पूछ ही लेती हैं, कि कहाँ जा रही हूँ, या कहाँ से आ रही हूं। मानो की मेरे आने जाने का सम्बन्ध उनके अपने जीवन से भी जुड़ा हो। अधिकतर ये महिलाएँ घरेलू सहायिकाएं होती हैं, लेकिन इस तरह के सवाल मात्र उनके संवाद में सहायक भूमिका निभाने के लिए होते हैं।

जल को जीवन कहना संभवतया इसलिये भी उचित होता है कि इसके समीप आते ही हम एक अलग ताजगी पाते हैं। जल में बच्चे सी खिलखिलाहट होती है, हलचल होती है, जल से जीवन है, यह विचार यूँ ही तो नहीं आया।

अब मैंने धीरे धीरे आगे के स्टेशनोपर जाना शुरु किया। गूगल सर्च करके, म्यूजिमों का पता नोट किया, और  उनकी यात्रा पर भी चलने लगी।

यहाँ इतवार को म्यूजम में एन्ट्री फीस केवल एक यूरों होती है तो सबसे पहले रविवार कौ ही म्यूजम गई। सबसे पहली यात्रा  Pinakothek der Moderne की थी, जिसके बारे में आगे आराम से चर्चा करूंगी, क्यों कि म्यूजिम को देखना एक अलग अनुभव होता है।

झील का वह स्टेशन दिखाई दिया, जहाँ झील का पूरा आनन्द लिया जा सकता है।
पांवों में बन्ढ़न हम खुद बान्धते हैं,  उनके खुलने पर भी दौड़ना शुरु नहीं करते, क्यों का बन्धन का अहसास ही तब असली बन्धन बन जाता है़ , अब मैंने दूसरे दिन से नियम बना लिया कि सुबह उठते ही लिखने पढ़ने बैठ जाती, और करीब तीन बजे के आसपास नहाना धोना शुरु करती और चार बजे घर से निकल जाती, फिर जो ट्रेन आती उसे पकड़ सबसे पहले स्टानबर्ग  स्टेशन चली जाती।

विस्तार में फैली झील, अलग अलग तट, कहीं महिलाएं धूप स्नान कर रही है, कहीं बतखें तट पर आकर दर्शकों का मन बहला कर भोजन कमा रही हैं, तो कहीं जहाज से लोग उतर रहे हैं, उन दिनों अच्छी धूप थी, और धूप में पूरा जर्मनी बाहर निकल पड़ता हैं। मैं घन्टों टहलती रही, और फिर ट्रेन पकड़ कर लौट आई। यूरोप में उम्र की कोई बाधा नहीं, मैंने ना जाने कितने वृद्धों को अकेले या मित्रों के साथ झील के किनारे देखा, यहाँ अकेले घूमना भी सवाल नहीं खड़े करता है।  मुझे लगा कि हमारे देश में हम अपने आसपास ना जाने कितने बन्धन बाँढ़ लेते हैं। केरल में तो मैं घर से बाहर यदि पैदल निकल गई तो दो चार महिलाएं रोक कर पूछ ही लेती हैं, कि कहाँ जा रही हूँ, या कहाँ से आ रही हूं। मानो की मेरे आने जाने का सम्बन्ध उनके अपने जीवन से भी जुड़ा हो। अधिकतर ये महिलाएँ घरेलू सहायिकाएं होती हैं, लेकिन इस तरह के सवाल मात्र उनके संवाद में सहायक भूमिका निभाने के लिए होते हैं।

जल को जीवन कहना संभवतया इसलिये भी उचित होता है कि इसके समीप आते ही हम एक अलग ताजगी पाते हैं। जल में बच्चे सी खिलखिलाहट होती है, हलचल होती है, जल से जीवन है, यह विचार यूँ ही तो नहीं आया।

अब मैंने धीरे धीरे आगे के स्टेशनोपर जाना शुरु किया। गूगल सर्च करके, म्यूजियमों का पता नोट किया, और  उनकी यात्रा पर भी चलने लगी।

यहाँ इतवार को म्यूजम में एन्ट्री फीस केवल एक यूरों होती है तो सबसे पहले रविवार कौ ही म्यूजियम गई। सबसे पहली यात्रा  Pinakothek der Moderne की थी, जिसके बारे में आगे आराम से चर्चा करूंगी, क्यों कि म्यूजिम को देखना एक अलग अनुभव होता है।


Wednesday, January 4, 2017

Villa Walbreta-3

 अभी अभी तो यहीं थी, ठीक मेरी खिड़की
के सामने
वह नदी कहाँ गई??????

नदी का खोना जिन्दगी की पैरहन से गलहार का उतरना है,

कल जिस झील को अपनी बालकनी से देख कर मैं मन्त्रमुग्ध हो रही थी, वह मानो पूरी तरफ गायब थी, दिल धक्क सा रह गया, कहीं यह बुरा सपना तो नहीं, लेकिन जब आँखें कुछ स्थिर हुई तो पाया कि नदी कोहरे से ढ़ंक गई  है, झील के पीछे झांकती पहाड़ियों की गर्दन तक कोहरे की चादर चढ़ गई है।

मैं गरम कपड़े पहन कर बाहर निकल पड़ती हूं", कुछ पैदल चलने के मोह से, और रास्ते पहचानना भी चाहती हूँ, विला पहाड़ी पर है, फिल्डाफिंग रेलवे स्टेशन से उतर कर ऊपर चढ़ना पड़ता है,  इसलिये सड़क मानों गोलाई में घुमती सी लगती है, मुझे अभी तक रास्तों की पहचान नहीं हो पाई है, यूरोप में हर जगह नक्शे बने होते हैं, और ज्यादातर लोग नक्शा पढ़ कर चलते हैं, लेकिन मुझे नक्शे समझ ही नहीं आते।
मेरे लिए सहज है पूछ कर चलना, और मैंअधकतर यही रास्ता अपनाती हूँ, लेकिन इस जन रहित गाँव से प्रान्त में मार्निंग वाक के लिये क्या पूँछू, किससे पूँछू, तो बस एक दिशा पकड़ कर चल देती हूँ, और सोचती हूँ कि कुछ चलने के बाद इसी रास्ते से लौट आऊंगी,

चलते चलते मैं अपने प्रोजेक्ट के बारे में सोचती हूँ, कैसे आरम्भ करू। सड़क के किनारे छोटे छोटे आलूबुखारे का दरख्त हैं, जिसने अध पके फलों को नीचे गिरा दिया है, मैं एक फल उठा कर पौँच कर मुंह में रखती हूँ। बचपन में मामा के गाँव में जमीन पर गिरे फलों को ना जाने कितनी बार खाया है... खट्टमिट्ठा बुखारा अपने रस को भीतर तक निचौड़ देता है।

. सबसे पहले यही सोचा कि बस वैसे ही अपने आप को खाली करना पड़ेगा, जैसे कि सड़क के किनारे लगे आलूबुखारे के दरख्त ने अपने को खाली कर दिया। पके फलों को इस तरह से झाड़ दिया कि मानों कोई सम्बन्ध ही ना हो। मोह को झाड़ना बस दरख्तों को आता है, फल पक गये, एक चक्र पूरा हो गया, उन्हें  जाना है,

मैं नीचे झुक कर उन फलों को बटोरने का सोचती हूँ, लेकिन अधिकतर फट चके हैं, फलों को क्या फरक पड़ता है कि उन्हे पंछी खाये या वे जमीन के कीड़े,,,, उनकी नियति सिर्फ पकना है, और वे ये काम शिद्दत से करते हैं, यह इंसान ही है जो कच्चे पक्के फलों को समय से पहले पकाना चाहता है, निसन्देह समय से पहले पकने में फलों का दम जरूर घुटता होगा....

हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के चक्र को तोड़ना नहीं चाहा, फल भी  खाये तो दरख्त से मांग कर खाये, अपने देह दर्द के उपचार करने को भी छीना झप्पट्टी नहीं की,,,, अथर्ववेद के समस्त उपचार सम्बन्धी मन्त्रो में प्रकृति से प्रार्थना की है। उनसे सहयोग मांगा है, तभी तो उनका उपचार सफल हुआ होगा।

यही प्रोजेक्ट लेकर आई हूँ ना मैं,,,,

आज पहले दिन की यात्रा ने ही काफी बीज दिये हैं सोचने को, मैं आकर कुछ नोट्स बनाने की कोशिश करती हूँ, लेकिन ना जाने क्यों अब मुझे लेपटाप की जगह कागज पन्नों में लिखना भा रहा है।  विला की डायरेक्टर की तरफ से खत आया है कि बारह तारीख को दस बजे म्यूनिख  की पत्रकार इन्टर्व्यू लेने आयेंगी,  हम पाँचो आर्टिस्टों को अपने अपने प्रोजेक्ट  के बारे में बात करनी है।
इसलिए मैंने अपने मन में एक रूप रेखा बनानी शुरु कर दी।

इस बेहद खूबसूरत सन्नाटे में मेरा दीमाग दो रास्ते पर चलने लगा है, एक और मैं अपने प्रोजेक्ट के बारे में सोचती हूँ तो दूसरी ओर मेरी अच्छी बुरी स्मृतियाँ मुझ पर बन्दर के बच्चे सी चढ़ गई हैं।

यह जाना है कि विश्वास टूटने के लिए ही होता है, और यह भी कि  मोह के धागे मजबूत होते हैं, लेकिन उन्हें कच्चा करना भी एक जरूरत है, जितना हम धागों से उलझते जाते हैं, उतने वे हमसे लिपटते जाते हैं, ..

फिर भी क्या जरुरत थी ऋषि मुनियों को पहाड़ो पर जाने की, क्यों बुद्धत्व के लिये ऊँचाई का महत्व बढ़ता गया.... अजीब बात यह भी है कि  वे जितना ऊपर चढ़ते थे, उतना वे उतारते भी जाते थे, लबादे कम होते जाते, अन्त में बस एक चीर,,,,

मेरा दीमाग भी खुल रहा है,,,,,,

विषय कुछ अधिक स्पष्ट हो रहा है, कितने बरस बीत गए प्रकृति से सीधा समन्ध बनाये जमाना बीत गया, बचपन में मामा के गाँव में बितायें दिनों के अलावा शायद ही कभी प्रकृति के इतने निकट रहने का मौका मिला हो. चिड़ियों की चहचहाट इतनी स्पष्ट शायद ही कभी सुनाई दी हों। हवा की सरसराहट, बादलों का रंग बदलना, सब कुछ कितना नया नया लग रहा है....

11.8.16

Tuesday, January 3, 2017

Villa Walabreta - Andechs Abbey

अपने जर्मनी प्रवास के बारे में सोचने बैठती हूँ तो पूरा वक्त चलचित्र सा आँखों के सामने गुजर जाता है। एक खुशनुमा चित्र, ...

जब मैं वालब्रेटा में  अपने अपार्टमेन्ट में पहुँची तो लगा कि फिल्म की रील धीरे ‍- धीरे खुल रही है, लेकिन बहुत स्पष्ट नहीं है़ । ऐसी स्थित  मेरे साथ हर यात्रा में होती है,  हर बार नये पन्ने खुलते हैं,लेकिन किताब के खुलने में वक्त लगता है। तभी युवा शोरलेट्टे मेरे कमरे में आईं, और बोली कि, कल हम लोग - Andechs Abbey  जाने वाले हैं, यदि मैं चाहूं तो साथ चल सकती हूँ, उस वक्त मैं इतनी थकी थी कि मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही थी, लेकिन मैंने धन्यवाद देते हुए कहा कि मैं सोचती हूँ कि मैं चल सकूंगी, बस आज अच्छी तरह से आराम करना पड़ेगा।
आप मुझे वक्त बता दे, जब मुझे तैयार होना है, उन्होंने कहा कि हम लोग 8  बजे तक विला से निकल जायेंगे, साथ में जापानी कलाकार हिसाको भी है। मैंने अगले दिन मिलने का वायदा किया और सोचने लगी कि किस तरह से अपने को तैयार करना है।
मेरा अपार्टमेन्ट मेरे लिये ड्रीम हाउस था। झील और बालकनी की तरफ खुलता बेडरूम, और लम्बा सा स्टडी, जिसके एक तरफ लम्बी सी बालकनी थी। बालकनी के दरवाजे से कमरे के भीतर तक आती हुई  धूप,कुनकुनी सी सर्दी, अपने बचपन की रजवाड़ी सर्दी का अहसास दिलवाती हुई, , मैंने धूप के सामने अपनी रजाई फैला ली और उस पर सो गई. ना जाने कितना अर्सा बीत गया था धूप में सोए हुए, इसलिये सोना जारी रहा।

देर शाम को उठी तो जरा बहुत कमरा लगाया , सामान अलमारियों मे जमाया, क्यों कि चार पाँच दिन बाद चीन की यात्रा थी, इसलिए वो कपड़े अलग किये जो साथ लेजाने थे, क्यों कि इस बार मैं छोटा वाला सूटकेस ही साथ लेजाने का विचार कर चुकी थी। एनरेटे नें सुबह शापिंग करवा ही दी थी, तो रसोई में जाकर खाना बनाना ही रह गया था। जिस तरह के बर्तन थे, उनमें भारतीय खाना बनाना मूर्खता ही होती तो ब्रेड के साथ फल सब्जिया काट कर आराम से भोजन किया और फिर सो गई, लेकिन अब तक अगले दिन  Andechs Abbey जाने की ताकत आ गई थी। यूरोप के बारे में मुझे एक बात की जानकारी तो थी कि यहाँ मौसम मिनिट- मिनिट में बदलता है, लेकिन कल का मौसम क्या होगा, Andechs Abbey कैसी जगह है, वहाँ किस तरह के कपड़ों की जरूरत होगी, समझ नहीं पा रही थी।

अपने साथ केवल 23 किलों सामान ला सकती थी, जिनमें कपड़ों के साथ किताबें भी थीं, तो गरम कपड़ों के नाम पर एक कोट और एक स्वेटर ही साथ था, कपड़े के जूते भी साथ नहीं रख पाई थी, इसलिये सोच विचार में तो थी, लेकिन फिर सोचा , जो होगा देखा जायेगा, दूसरे दिन के लिए कुछ कपड़े निकाल कर फिर सो गई। दूसरे दिन तड़के ही नीन्द खुल गई, सुबह आठ बजे तक नीचे इकट्ठे होने की बात थी, तो मुझे नहाने धोने और तैयार होने में वक्त नहीं लगा।
शोरलेट्टे  जर्मन मूल की है लेकिन आर्मस्ट्रंग की वासी  कलाकार है, जो बेहद अनूठी कलाकारिता के कारण मुझे पसन्द आईं। वे अपने मंगेतर के साथ कार में आई थीं, और मंगेतर दो दिनों में वापिस लौटने वाले थे, तो शायद कार के सही उपयोग के लिए उन्होंने मुझे और अन्य जापानी कलाकार को भी अपनी यात्रा में शामिल कर लिया था।

हम लोग वक्त पर रवाना हो गये, शोरलेट्टे और उसके मंगेतर , और जापान की हिसाको।
Andechs Abbey  एक तीर्थयात्रा स्थल ही माना जा सकता है जो स्तानबर्ग नामक झील के करीब पहाड़ी पर स्थित है। लेकिन मजे की बात यह कि यह स्थल अपनी बीयर के भी लोकप्रिय है। यह बीयर चर्च में बनाई जाती है, लोग कहते हैं कि लोग यहाँ बीयर और जर्मनी का लोकप्रिय खाना भुना पोर्क बेहद पसन्द किया जाता है।

मेरे लिए  सब कुछ अनजाना सा था, कोई भी राह समझ में नहीं आ रही था। हम लोग एक पहाड़ी के नीचे पहुँचे, और वहाँ से पैदल चलना शुरु किया। यूरोप में भी तीर्थ स्थानों में पैदल चल कर पहुँचने का रिवाज है, अनेक तीर्थस्थल पहाड़ियों पर स्थित हैं।
संभवतया  प्रकृति के करीब पहुंचना देव के करीब पहुंचने का पर्याय ही तो है।
हम लोग खरामा - खरामा चढ़ाई चढ़ने लगे, बीच बीच में रुकते, पेड़ पत्रियों को परखते, घाटी से झांकते, और फिर चल देते। यही अन्तर होता है कलाकारों के साथ की गई यात्रा और सामान्य यात्रियों में। हम चारों लोग चार क्षेत्र के थे, शोरलेटे के मंगेतर मूलतया फोटोग्राफरथे, तो उनकी निगाह फोटोजनिक दृश्यों कों खोजती। हिसाकों का सम्बन्ध सुगनधों से था,  वे हर खुशबू को पहचानने की कोशिश करतीं। शोरलेटे का विषय चित्रकारिता और धातु कला थी, और आकृति ही उनके लिये प्रधान थी, इसलिये, वे हर आकृति को देखती, मैं उन तीनों की दृष्टि का लाभ अपने विषय में खोज रही थी।

काफी देर तक हम आनन्द लेते चलते रहे, लेकिन बाद में सीढ़िया आ गई, मेरे साथ सबसे बड़ी समस्या सीढ़ियों की होती है, मैं सीढ़ी चढ़ते ही बुरी तरह हाँफने लगती हूँ, जिम जाना भी इस परेशानी को खत्म नहीं कर पाया है।
निसन्देह ऊपर तक पहुँचते पहुँचते मेरी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी। लेकिन हम अब तक चर्च पहुंच चुके थे।

ये चर्च संभवतया रोमन काल का है , और साधारण बनावट का है। इसकी छत से म्यूनिख शहर दिख सकता है, लेकिन मेरी और सीढ़ियां चढ़ने की हिम्मत ही नहीं हुई। मैं खिड़की पर बैठ कर वातावरण का अनुभव लेने लगी। अगर इतिहास और विश्वास को दरकिनार कर दूं तो यह चर्च बेहद साधारण लगा, खास तौर से इसलिए कि मैं मैं रोम, वेनिस अदि के बेहतरीन चर्चों को देख चुकी थी।  फिर मुझे लगा कि यह साधारण इमारत ही इसकी खासियत है, यह निसन्देह प्रार्थना केन्द्र रहा होगा, जहाँ भव्यता या चमक से प्रार्थना को अधिक महत्व दिया जाता रहा होगा। बाद में कुछ लोगों ने यह भी बताया कि लोग यहाँ की बेहतरीन बीयर से आकर्षित होकर आते हैं, यहाँ सात तरह की बीयर मिलती हैं। बात सच भी लगी, क्यों कि जब हम चर्च के करीब भोजन स्थल में पहुँचे तो देखा कि जगह ठसाठस भरी थी। लोग बीयर और पोर्क का आनन्द उठा रहे थे, भुना पोर्क जिसकी आकृति एक साबुत मुर्गे सी तो होगी, कई तश्तरियों में दिखाई दे रहा था।

हम लोगों अपने अपने खाने की लाइन में लग गए , मैंने खास बावेरियन चिकन का एक दुकड़ा और ब्रेड ली। सबने अपनी अपनी पसन्द का खाना लिया। खाने का आनन्द यहीं पर दिखाई दिया। मैंने देखा कि लोग आपस में खूब घुलते -मिलते हैं, और खूब गप्पबाजी भी करते हैं। ऐसा लगा कि यहाँ हर कोई हर किसी को जानता है,

हंसते खिलखिलाते लोगों के साथ बैठ कर खाना खाना अच्छा अनुभव होता है ।जब शाम होने लगी तो हम लौटने को तैयार हुए,,,,,
लौटते वक्त हम लोग बीयर लाकर में गए, जहाँ बीयर के बड़े बड़े ढोल की आकृति के बर्तन रखे थे, वहा पर बकायदा लाकर थे, जिसमें लोग अपने बीयर पीने के जार के साथ अपनी बीयर भी रख सकते हैं। उस लम्बे से हाल में बीयर को सुरक्षित रखने वाले जो बर्तन थे, वे पुरातन काल के ज्यादा लग रहे थे। निसन्देह यह चर्च ऐसी जगह बन गया है जहाँ लोग हर सप्ताह आकर बीयर आदि का आनन्द उठा लें... विश्वास में आनन्द भी शामिल हो तो क्या बात है।
सीढ़ियों कपर  चढ़ने पर मेरी सांस फूलने की स्थिति को देख शोरलेट्टे चिन्तित थीं, उन्होने पूछा कि मैं चाहूं तो मैं यही इंतजार कर सकती हूँ, और वे लोग कार लेक र मुझे लेने आ जायेंगे, लेकिन मैंने मना कर दिया, क्यों कि मैं जानती थी कि उतरना मुश्किल नहीं होता है।
लौटते वक्त मैं और शोरलोट्टे साथ थे, हम लोग राजनीतिक स्थितियों की बात करने लगे। मैंने कहा कि युद्ध के बाद जर्मनों के साथ जो कुछ हुआ, वह भी दुखद था, क्यों कि समस्या किसी एक राजनेता ने उत्पन्न की थी।

तो शोरलोट्टे ने जवाब दिया.. "जब जनता किसी गलत नेता को चुनती है तो वह उसके पाप में बराबर की भागीदार बन जाती है,,,,"

"निसन्देह, लेकिन जनता भीड़तन्त्र के साथ चलती है",,,,,

"फिर भी गलती तो है ही", शोरलेट्टे का जवाब था।

गलती का पता जब तक लगता है, अकसर देर हो जाती है, मैं कहना चाहती थी, लेकिन चुप रही।

जर्मनी के हिसाब से बेहतरीन मौसम था, और मेरे लिए सुन्दर दिन

क्रमशंः


10.8.1016






Sunday, December 18, 2016

VillaWalbreta,, a journey of dreamland - part-1

इतने अन्तर्राष्ट्रीय कवि मित्रों से आर्टिस्ट रेसीडेन्सी के बारे में काफी सुना था, लेकिन कभी कोशिश ही नहीं की। पहली बात तो यह थी कि मैं खुद ही इतनी आशान्वित नहीं थी, कि  किसी अजनबी जगह जाकर कुछ लम्बे वक्त तक रहूँ, दूसरा यह भी था कि मैं सोच नहीं पा रही थी कि कौन सा प्रोजेक्ट उपयुक्त होगा़ , हालांकि मैंने कुछ तथाकथित मशहूर कवियों को अपनी कविताओं के अनुवाद जैसे प्रोजेक्ट के लिए भी बाहर जाते देखा है।
फिर कृत्या फेस्टीवल काफी वक्त और शक्ति ले लेता है। लेकिन जब अगुस्ता ने मुझे जर्मनी के विला बालब्रेटा के बारे में बताया तो थोड़ा उत्साह जगा। अगुस्ता एक कवितोत्सव चलाती हैं, , वे चाहती थी कि मैं उस उत्सव में भाग लूँ। इसलिए उन्होंने प्रसिद्ध विला वालब्रेटा नामक रेसीडेन्सी के लिये मेरा नाम दिया, जिससे मैं उनके उत्सव में भी भाग ले सकूं।

विला वालब्रेटा रेसीडेन्सी एक बेहद प्रसिद्ध रेसीडेन्सी है, जिसमें चुनाव जर्मन कलाकारों की प्रस्तुति पर होता है, यहां रहने के लिए विला के बेहद खूबसूरत अपार्टमेन्ट है, जिसमें सोने, पढ़ने के कमरे के साथ रसोई तक होती है, और साथ में एक अच्छी रकम खाने पीने के नाम पर स्कालरशिप के रूप में दी जाती है।

मुझे अगस्त और सितम्बर के मास के लिये विला में स्थान मिला, अगस्ता का फेस्टीवल अक्तूबर में था, इसलिये तीसरे महिने के लिये उन्होंने म्यूनिख नगर के Ebenboeckhaus नामक रेसीडेन्सी के लिये नाम दिया, यहाँ रहने की सुविधा अच्छी थी, लेकिन कोई स्कालर शीप नहीं थी, यानी कि मुझे विला से मिली स्कालर शिप में ना केवल तीन महिने खाना खाना था, बल्कि अपनी यात्रा के टिकिट का पैसा भी निकालना था।

लेकिन दो रेसीडेन्सी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि मुझे जर्मनी के ग्रामीण और शहरी जीवन का अनुभव हो गया, और सम्भाल कर खर्च करना भी आ गया।

जाने से पहले का वक्त कुछ भागमभाग से भरा था, क्यों कि छोटी बेटी , जो दो साल से देश नहीं आ पाई थी, बीस बाइस जुलाई तक ही आ पारही थी, क्यों कि ब्रिटेन के नियमों के अनुसार वह अपनी छोटी सी बेटी का स्कूल नहीं भंग करवा सकती थी। अब मेरी और उसकी चाहना थी कि कम से कम बीस दिन तो साथ रहें।  जाने से पहले का वक्त बेहद भागम भाग से भरा था, नातिन इस उम्र में पहुंच गई थी, कि उसे घुमाने लेजाना जरूरी था, बेटी को शापंिग करवानी थी, और मुझे जाने की तैयारी। इस बीच एक और बात यह हूई कि मुझे शंघाई के प्रसिद्ध बुक फेयर में जाने का इनविटेशन मिला था, और मुझे जर्मनी से आने की सुविधा भी दी गई थी, अतः तैयारी एक तरह से दो फेस्टीवलों और दो रेसीडेन्सी के लिये करना था।

टिकिट कुछ इस तरह था, कि मैं और बेटी एक ही वक्त निकल कर साथ मुम्बई पहुँचे, बेटी नासिक के लिए रवाना हो गई, ओर मैं जर्मनी के लिये, लेकिन पिछले दो दिनों  में अखिर काम निपटाते निपटाते में इतनी थक गई थी यात्रा सुखद नहीं लग पा रही थी, तीन दिनों के रतजगे के बाद जब म्यूनिख पहुंची तो सिर और शरीर इतना भारी था कि बस सोजाने की इच्छा हुई। अगुस्ता ने मुझे बताया था कि उनकी मित्र एनरेटे  मुझे लेने आयेंगी, मैं ना उन्हे जानती थी, ना वे मुझे, इसलिये मैं हर स्थिति के लिये तैयार थी। लेकिन आश्चर्य तब हुआ कि हम दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया।
एयरोड्रम से विला वालब्रेटा की यात्रा कम लम्बी नहीं थी, कार में ही हम लोगों को कम से कम डेड़ घन्टा लग गया। विला म्यूनिख से बाहर फिल्दाफिन Feldafing नामक गाँव में है, जो बेहद खूबसूरत झील वाले स्टार्नबर्ग Starnberg, कस्बे में पड़ता है। 
फिल्डाफिंग झील के किनारे होते हुए भी पाड़ी इलाके सा खूबसूरत है, जिसमें पतली पतली गलियाँ पहाड़ी पर घूमती रहती है। रेसीडेन्सी में जाने से पहले मैंने एनरेटे से कहा कि मझे पहले किसी स्टोर में ले चले, क्यों कि बाद मैं मुझे खोजने में दिक्कत होगी।
म्यूनिख में रेवे नाम से स्टोर चलते हैं, एनरेटे मुझे सबसे पहले रेवे ही ले गई। मैंने अपनी समझ के अनुसार तीन चार दिन का खाना खरीद लिया, क्यों कि चार पाँच दिनों के बाद मुझे शंघाई जाना ही था।

विला में केयर टेकर इतंजार कर रहे थे, जिन्होंने मेरे पहुंचते ही कमरे की चाभी के साथ मेरी स्कारशिप की पहली किस्त दे दी, जिस संजीदगी से काम हो रहा था, वह काबिले तारीफ था।
 विला में पाँच कलाकार एक साथ रहते हैं, जिनके अलग अलग अपार्टमेन्ट होते हैं। मुझे अपना अपार्टमेन्ट देख कर बेहद खुशी हुई, खूबसूरत सा सोने का कमरा, बड़ा सा पढ़ने लिखने का कमरा, एक बालकनी, छोटी सी रसोई और सुन्दर सा बाथरूम।
एनेट्टे मुझे छोड़ कर चली गई, रास्ते भर वे मुझ से सवाल पूछती रही थीं. जिससे महसूस हो रहा था कि काफी जानकार हैं, बाद में पता चला की वे बेहद प्रसिद्ध संगीतकार पिता की बेटी है, और स्वयं भी साउण्ड इंजीनियरिंग से सम्बन्ध रखती है। पता नहीं क्यों ‌और कैसे हम दोंनो में एक अच्छा सम्बन्ध सा बन गया।
कमरे में जाते ही एक अन्य सह कलाकार शोरलेट्ट से मुलाकात हुई, उन्होंने बताया कि वे कल Andechs Abbey जा रहें है, यदि मैं चाहूँ तो  उनके साथ चल सकती हूँ, सच कहूं तो मैं ५तनी थकी थी कि मूंह से बोल तक नहीं निकल रहे थे, लेकिन मैंने उनसे कहां कि मै कोशिश करूंगी कि मैं समय पर नीचे आकर मिल लूं,

बस, इस तरह से मैंने अपने पहले दिन को विदा सा कहा, और दिन के करीब दो बजे से जो सोई तो बस सोती ही रही। लेकिन शाम को जब अपनी बालकनी से झील का नजारा देखा तो महसूस हुआ कि जि्नदगी में इतनी खूबसूरत जगह शायद ही कभी नसीब हुई होगी.....


9.8.2016