Tuesday, January 3, 2017

Villa Walabreta - Andechs Abbey

अपने जर्मनी प्रवास के बारे में सोचने बैठती हूँ तो पूरा वक्त चलचित्र सा आँखों के सामने गुजर जाता है। एक खुशनुमा चित्र, ...

जब मैं वालब्रेटा में  अपने अपार्टमेन्ट में पहुँची तो लगा कि फिल्म की रील धीरे ‍- धीरे खुल रही है, लेकिन बहुत स्पष्ट नहीं है़ । ऐसी स्थित  मेरे साथ हर यात्रा में होती है,  हर बार नये पन्ने खुलते हैं,लेकिन किताब के खुलने में वक्त लगता है। तभी युवा शोरलेट्टे मेरे कमरे में आईं, और बोली कि, कल हम लोग - Andechs Abbey  जाने वाले हैं, यदि मैं चाहूं तो साथ चल सकती हूँ, उस वक्त मैं इतनी थकी थी कि मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही थी, लेकिन मैंने धन्यवाद देते हुए कहा कि मैं सोचती हूँ कि मैं चल सकूंगी, बस आज अच्छी तरह से आराम करना पड़ेगा।
आप मुझे वक्त बता दे, जब मुझे तैयार होना है, उन्होंने कहा कि हम लोग 8  बजे तक विला से निकल जायेंगे, साथ में जापानी कलाकार हिसाको भी है। मैंने अगले दिन मिलने का वायदा किया और सोचने लगी कि किस तरह से अपने को तैयार करना है।
मेरा अपार्टमेन्ट मेरे लिये ड्रीम हाउस था। झील और बालकनी की तरफ खुलता बेडरूम, और लम्बा सा स्टडी, जिसके एक तरफ लम्बी सी बालकनी थी। बालकनी के दरवाजे से कमरे के भीतर तक आती हुई  धूप,कुनकुनी सी सर्दी, अपने बचपन की रजवाड़ी सर्दी का अहसास दिलवाती हुई, , मैंने धूप के सामने अपनी रजाई फैला ली और उस पर सो गई. ना जाने कितना अर्सा बीत गया था धूप में सोए हुए, इसलिये सोना जारी रहा।

देर शाम को उठी तो जरा बहुत कमरा लगाया , सामान अलमारियों मे जमाया, क्यों कि चार पाँच दिन बाद चीन की यात्रा थी, इसलिए वो कपड़े अलग किये जो साथ लेजाने थे, क्यों कि इस बार मैं छोटा वाला सूटकेस ही साथ लेजाने का विचार कर चुकी थी। एनरेटे नें सुबह शापिंग करवा ही दी थी, तो रसोई में जाकर खाना बनाना ही रह गया था। जिस तरह के बर्तन थे, उनमें भारतीय खाना बनाना मूर्खता ही होती तो ब्रेड के साथ फल सब्जिया काट कर आराम से भोजन किया और फिर सो गई, लेकिन अब तक अगले दिन  Andechs Abbey जाने की ताकत आ गई थी। यूरोप के बारे में मुझे एक बात की जानकारी तो थी कि यहाँ मौसम मिनिट- मिनिट में बदलता है, लेकिन कल का मौसम क्या होगा, Andechs Abbey कैसी जगह है, वहाँ किस तरह के कपड़ों की जरूरत होगी, समझ नहीं पा रही थी।

अपने साथ केवल 23 किलों सामान ला सकती थी, जिनमें कपड़ों के साथ किताबें भी थीं, तो गरम कपड़ों के नाम पर एक कोट और एक स्वेटर ही साथ था, कपड़े के जूते भी साथ नहीं रख पाई थी, इसलिये सोच विचार में तो थी, लेकिन फिर सोचा , जो होगा देखा जायेगा, दूसरे दिन के लिए कुछ कपड़े निकाल कर फिर सो गई। दूसरे दिन तड़के ही नीन्द खुल गई, सुबह आठ बजे तक नीचे इकट्ठे होने की बात थी, तो मुझे नहाने धोने और तैयार होने में वक्त नहीं लगा।
शोरलेट्टे  जर्मन मूल की है लेकिन आर्मस्ट्रंग की वासी  कलाकार है, जो बेहद अनूठी कलाकारिता के कारण मुझे पसन्द आईं। वे अपने मंगेतर के साथ कार में आई थीं, और मंगेतर दो दिनों में वापिस लौटने वाले थे, तो शायद कार के सही उपयोग के लिए उन्होंने मुझे और अन्य जापानी कलाकार को भी अपनी यात्रा में शामिल कर लिया था।

हम लोग वक्त पर रवाना हो गये, शोरलेट्टे और उसके मंगेतर , और जापान की हिसाको।
Andechs Abbey  एक तीर्थयात्रा स्थल ही माना जा सकता है जो स्तानबर्ग नामक झील के करीब पहाड़ी पर स्थित है। लेकिन मजे की बात यह कि यह स्थल अपनी बीयर के भी लोकप्रिय है। यह बीयर चर्च में बनाई जाती है, लोग कहते हैं कि लोग यहाँ बीयर और जर्मनी का लोकप्रिय खाना भुना पोर्क बेहद पसन्द किया जाता है।

मेरे लिए  सब कुछ अनजाना सा था, कोई भी राह समझ में नहीं आ रही था। हम लोग एक पहाड़ी के नीचे पहुँचे, और वहाँ से पैदल चलना शुरु किया। यूरोप में भी तीर्थ स्थानों में पैदल चल कर पहुँचने का रिवाज है, अनेक तीर्थस्थल पहाड़ियों पर स्थित हैं।
संभवतया  प्रकृति के करीब पहुंचना देव के करीब पहुंचने का पर्याय ही तो है।
हम लोग खरामा - खरामा चढ़ाई चढ़ने लगे, बीच बीच में रुकते, पेड़ पत्रियों को परखते, घाटी से झांकते, और फिर चल देते। यही अन्तर होता है कलाकारों के साथ की गई यात्रा और सामान्य यात्रियों में। हम चारों लोग चार क्षेत्र के थे, शोरलेटे के मंगेतर मूलतया फोटोग्राफरथे, तो उनकी निगाह फोटोजनिक दृश्यों कों खोजती। हिसाकों का सम्बन्ध सुगनधों से था,  वे हर खुशबू को पहचानने की कोशिश करतीं। शोरलेटे का विषय चित्रकारिता और धातु कला थी, और आकृति ही उनके लिये प्रधान थी, इसलिये, वे हर आकृति को देखती, मैं उन तीनों की दृष्टि का लाभ अपने विषय में खोज रही थी।

काफी देर तक हम आनन्द लेते चलते रहे, लेकिन बाद में सीढ़िया आ गई, मेरे साथ सबसे बड़ी समस्या सीढ़ियों की होती है, मैं सीढ़ी चढ़ते ही बुरी तरह हाँफने लगती हूँ, जिम जाना भी इस परेशानी को खत्म नहीं कर पाया है।
निसन्देह ऊपर तक पहुँचते पहुँचते मेरी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी। लेकिन हम अब तक चर्च पहुंच चुके थे।

ये चर्च संभवतया रोमन काल का है , और साधारण बनावट का है। इसकी छत से म्यूनिख शहर दिख सकता है, लेकिन मेरी और सीढ़ियां चढ़ने की हिम्मत ही नहीं हुई। मैं खिड़की पर बैठ कर वातावरण का अनुभव लेने लगी। अगर इतिहास और विश्वास को दरकिनार कर दूं तो यह चर्च बेहद साधारण लगा, खास तौर से इसलिए कि मैं मैं रोम, वेनिस अदि के बेहतरीन चर्चों को देख चुकी थी।  फिर मुझे लगा कि यह साधारण इमारत ही इसकी खासियत है, यह निसन्देह प्रार्थना केन्द्र रहा होगा, जहाँ भव्यता या चमक से प्रार्थना को अधिक महत्व दिया जाता रहा होगा। बाद में कुछ लोगों ने यह भी बताया कि लोग यहाँ की बेहतरीन बीयर से आकर्षित होकर आते हैं, यहाँ सात तरह की बीयर मिलती हैं। बात सच भी लगी, क्यों कि जब हम चर्च के करीब भोजन स्थल में पहुँचे तो देखा कि जगह ठसाठस भरी थी। लोग बीयर और पोर्क का आनन्द उठा रहे थे, भुना पोर्क जिसकी आकृति एक साबुत मुर्गे सी तो होगी, कई तश्तरियों में दिखाई दे रहा था।

हम लोगों अपने अपने खाने की लाइन में लग गए , मैंने खास बावेरियन चिकन का एक दुकड़ा और ब्रेड ली। सबने अपनी अपनी पसन्द का खाना लिया। खाने का आनन्द यहीं पर दिखाई दिया। मैंने देखा कि लोग आपस में खूब घुलते -मिलते हैं, और खूब गप्पबाजी भी करते हैं। ऐसा लगा कि यहाँ हर कोई हर किसी को जानता है,

हंसते खिलखिलाते लोगों के साथ बैठ कर खाना खाना अच्छा अनुभव होता है ।जब शाम होने लगी तो हम लौटने को तैयार हुए,,,,,
लौटते वक्त हम लोग बीयर लाकर में गए, जहाँ बीयर के बड़े बड़े ढोल की आकृति के बर्तन रखे थे, वहा पर बकायदा लाकर थे, जिसमें लोग अपने बीयर पीने के जार के साथ अपनी बीयर भी रख सकते हैं। उस लम्बे से हाल में बीयर को सुरक्षित रखने वाले जो बर्तन थे, वे पुरातन काल के ज्यादा लग रहे थे। निसन्देह यह चर्च ऐसी जगह बन गया है जहाँ लोग हर सप्ताह आकर बीयर आदि का आनन्द उठा लें... विश्वास में आनन्द भी शामिल हो तो क्या बात है।
सीढ़ियों कपर  चढ़ने पर मेरी सांस फूलने की स्थिति को देख शोरलेट्टे चिन्तित थीं, उन्होने पूछा कि मैं चाहूं तो मैं यही इंतजार कर सकती हूँ, और वे लोग कार लेक र मुझे लेने आ जायेंगे, लेकिन मैंने मना कर दिया, क्यों कि मैं जानती थी कि उतरना मुश्किल नहीं होता है।
लौटते वक्त मैं और शोरलोट्टे साथ थे, हम लोग राजनीतिक स्थितियों की बात करने लगे। मैंने कहा कि युद्ध के बाद जर्मनों के साथ जो कुछ हुआ, वह भी दुखद था, क्यों कि समस्या किसी एक राजनेता ने उत्पन्न की थी।

तो शोरलोट्टे ने जवाब दिया.. "जब जनता किसी गलत नेता को चुनती है तो वह उसके पाप में बराबर की भागीदार बन जाती है,,,,"

"निसन्देह, लेकिन जनता भीड़तन्त्र के साथ चलती है",,,,,

"फिर भी गलती तो है ही", शोरलेट्टे का जवाब था।

गलती का पता जब तक लगता है, अकसर देर हो जाती है, मैं कहना चाहती थी, लेकिन चुप रही।

जर्मनी के हिसाब से बेहतरीन मौसम था, और मेरे लिए सुन्दर दिन

क्रमशंः


10.8.1016






Sunday, December 18, 2016

VillaWalbreta,, a journey of dreamland - part-1

इतने अन्तर्राष्ट्रीय कवि मित्रों से आर्टिस्ट रेसीडेन्सी के बारे में काफी सुना था, लेकिन कभी कोशिश ही नहीं की। पहली बात तो यह थी कि मैं खुद ही इतनी आशान्वित नहीं थी, कि  किसी अजनबी जगह जाकर कुछ लम्बे वक्त तक रहूँ, दूसरा यह भी था कि मैं सोच नहीं पा रही थी कि कौन सा प्रोजेक्ट उपयुक्त होगा़ , हालांकि मैंने कुछ तथाकथित मशहूर कवियों को अपनी कविताओं के अनुवाद जैसे प्रोजेक्ट के लिए भी बाहर जाते देखा है।
फिर कृत्या फेस्टीवल काफी वक्त और शक्ति ले लेता है। लेकिन जब अगुस्ता ने मुझे जर्मनी के विला बालब्रेटा के बारे में बताया तो थोड़ा उत्साह जगा। अगुस्ता एक कवितोत्सव चलाती हैं, , वे चाहती थी कि मैं उस उत्सव में भाग लूँ। इसलिए उन्होंने प्रसिद्ध विला वालब्रेटा नामक रेसीडेन्सी के लिये मेरा नाम दिया, जिससे मैं उनके उत्सव में भी भाग ले सकूं।

विला वालब्रेटा रेसीडेन्सी एक बेहद प्रसिद्ध रेसीडेन्सी है, जिसमें चुनाव जर्मन कलाकारों की प्रस्तुति पर होता है, यहां रहने के लिए विला के बेहद खूबसूरत अपार्टमेन्ट है, जिसमें सोने, पढ़ने के कमरे के साथ रसोई तक होती है, और साथ में एक अच्छी रकम खाने पीने के नाम पर स्कालरशिप के रूप में दी जाती है।

मुझे अगस्त और सितम्बर के मास के लिये विला में स्थान मिला, अगस्ता का फेस्टीवल अक्तूबर में था, इसलिये तीसरे महिने के लिये उन्होंने म्यूनिख नगर के Ebenboeckhaus नामक रेसीडेन्सी के लिये नाम दिया, यहाँ रहने की सुविधा अच्छी थी, लेकिन कोई स्कालर शीप नहीं थी, यानी कि मुझे विला से मिली स्कालर शिप में ना केवल तीन महिने खाना खाना था, बल्कि अपनी यात्रा के टिकिट का पैसा भी निकालना था।

लेकिन दो रेसीडेन्सी का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि मुझे जर्मनी के ग्रामीण और शहरी जीवन का अनुभव हो गया, और सम्भाल कर खर्च करना भी आ गया।

जाने से पहले का वक्त कुछ भागमभाग से भरा था, क्यों कि छोटी बेटी , जो दो साल से देश नहीं आ पाई थी, बीस बाइस जुलाई तक ही आ पारही थी, क्यों कि ब्रिटेन के नियमों के अनुसार वह अपनी छोटी सी बेटी का स्कूल नहीं भंग करवा सकती थी। अब मेरी और उसकी चाहना थी कि कम से कम बीस दिन तो साथ रहें।  जाने से पहले का वक्त बेहद भागम भाग से भरा था, नातिन इस उम्र में पहुंच गई थी, कि उसे घुमाने लेजाना जरूरी था, बेटी को शापंिग करवानी थी, और मुझे जाने की तैयारी। इस बीच एक और बात यह हूई कि मुझे शंघाई के प्रसिद्ध बुक फेयर में जाने का इनविटेशन मिला था, और मुझे जर्मनी से आने की सुविधा भी दी गई थी, अतः तैयारी एक तरह से दो फेस्टीवलों और दो रेसीडेन्सी के लिये करना था।

टिकिट कुछ इस तरह था, कि मैं और बेटी एक ही वक्त निकल कर साथ मुम्बई पहुँचे, बेटी नासिक के लिए रवाना हो गई, ओर मैं जर्मनी के लिये, लेकिन पिछले दो दिनों  में अखिर काम निपटाते निपटाते में इतनी थक गई थी यात्रा सुखद नहीं लग पा रही थी, तीन दिनों के रतजगे के बाद जब म्यूनिख पहुंची तो सिर और शरीर इतना भारी था कि बस सोजाने की इच्छा हुई। अगुस्ता ने मुझे बताया था कि उनकी मित्र एनरेटे  मुझे लेने आयेंगी, मैं ना उन्हे जानती थी, ना वे मुझे, इसलिये मैं हर स्थिति के लिये तैयार थी। लेकिन आश्चर्य तब हुआ कि हम दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया।
एयरोड्रम से विला वालब्रेटा की यात्रा कम लम्बी नहीं थी, कार में ही हम लोगों को कम से कम डेड़ घन्टा लग गया। विला म्यूनिख से बाहर फिल्दाफिन Feldafing नामक गाँव में है, जो बेहद खूबसूरत झील वाले स्टार्नबर्ग Starnberg, कस्बे में पड़ता है। 
फिल्डाफिंग झील के किनारे होते हुए भी पाड़ी इलाके सा खूबसूरत है, जिसमें पतली पतली गलियाँ पहाड़ी पर घूमती रहती है। रेसीडेन्सी में जाने से पहले मैंने एनरेटे से कहा कि मझे पहले किसी स्टोर में ले चले, क्यों कि बाद मैं मुझे खोजने में दिक्कत होगी।
म्यूनिख में रेवे नाम से स्टोर चलते हैं, एनरेटे मुझे सबसे पहले रेवे ही ले गई। मैंने अपनी समझ के अनुसार तीन चार दिन का खाना खरीद लिया, क्यों कि चार पाँच दिनों के बाद मुझे शंघाई जाना ही था।

विला में केयर टेकर इतंजार कर रहे थे, जिन्होंने मेरे पहुंचते ही कमरे की चाभी के साथ मेरी स्कारशिप की पहली किस्त दे दी, जिस संजीदगी से काम हो रहा था, वह काबिले तारीफ था।
 विला में पाँच कलाकार एक साथ रहते हैं, जिनके अलग अलग अपार्टमेन्ट होते हैं। मुझे अपना अपार्टमेन्ट देख कर बेहद खुशी हुई, खूबसूरत सा सोने का कमरा, बड़ा सा पढ़ने लिखने का कमरा, एक बालकनी, छोटी सी रसोई और सुन्दर सा बाथरूम।
एनेट्टे मुझे छोड़ कर चली गई, रास्ते भर वे मुझ से सवाल पूछती रही थीं. जिससे महसूस हो रहा था कि काफी जानकार हैं, बाद में पता चला की वे बेहद प्रसिद्ध संगीतकार पिता की बेटी है, और स्वयं भी साउण्ड इंजीनियरिंग से सम्बन्ध रखती है। पता नहीं क्यों ‌और कैसे हम दोंनो में एक अच्छा सम्बन्ध सा बन गया।
कमरे में जाते ही एक अन्य सह कलाकार शोरलेट्ट से मुलाकात हुई, उन्होंने बताया कि वे कल Andechs Abbey जा रहें है, यदि मैं चाहूँ तो  उनके साथ चल सकती हूँ, सच कहूं तो मैं ५तनी थकी थी कि मूंह से बोल तक नहीं निकल रहे थे, लेकिन मैंने उनसे कहां कि मै कोशिश करूंगी कि मैं समय पर नीचे आकर मिल लूं,

बस, इस तरह से मैंने अपने पहले दिन को विदा सा कहा, और दिन के करीब दो बजे से जो सोई तो बस सोती ही रही। लेकिन शाम को जब अपनी बालकनी से झील का नजारा देखा तो महसूस हुआ कि जि्नदगी में इतनी खूबसूरत जगह शायद ही कभी नसीब हुई होगी.....


9.8.2016


Sunday, December 4, 2016

शायराना घरोन्दे में एक पंछी...



शायराना घरोन्दे में एक पंछी...



उसने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा
उसने एक बार भी जाते जाते विदा नहीं कहा
वह बस चुप हो गया
और अपने बाजे को भी नहीं उतारा

किसी ने फिर कोई खबर नहीं सुनी
वह किसी दिन अचानक नहीं चला आया
हालाँकि किसी को उसका इन्तजार नहीं था
और ना ही उसके लिए रोया

खाने की लम्बी मेज पर मंगोली नाक नक्शे वाले अहमत तैलि का दर्द केवल तुर्की नहीं। पूरी दुनिया वे सब मुलुक, जहाँ के लोक गायक विलुप्त होते जा रहे हैं , इस दर्द से साझा कर सकती है। हम होटल शीर यानी की शायरी के घरोन्दे में शायराना अन्दाज में सजी लम्बी सी मेज में तुर्क के खास कवियों का वक्तव्य सुन रहे हैं। इस्लामिक देशों से बेहद अलग, अमेरिकन राजनीति से प्रभावित इस देश का दर्द देखने में संभवतया महसूस नहीं होता, लेकिन शायरों, लेखकों ने इस दर्द को बेहद होशियारी से थामा हुआ है, दरअसल यहाँ के शायरों , लेककों और कलाकारों ने सरकार के नकेल बखूबी से पकड़ रखी है, यह उनकी वक्तव्यों से जाहिर होता है।

अहमत तैलि कह रहे हैं... हमे सरकार से कोई भय नहीं, वे हमें जेल में डाल कर देख ही चुके हैं,  हमारी कलम रुकती नहीं, हद से हद वे हमारी सर से छत उतार लेंगे, हमारी रोटी छीन लेंगे....जब तक यह होटल शायरी है, हमें उसकी भी चिन्ता नहीं। अब यह शीर होटल क्या, एक जुनून है इसात बोजबियक का , जो इस होटल के मालिक हैं। शीर में इसात ने कविता को मिट्टी गारे से रचा है, रंगो से सजाया है और फिर दिल से अपनाया है, शीर के सामने कलम दवात को थामे दो हाथ हैं, होटल में घुसते ही तुर्की कवियों की मूर्तियाँ दिखाई देंगी, दीवारों पर कवियों के चित्रों की बेहद खूबसूरती से प्रस्तुति...सोफों के कपड़ों पर कविता की पंक्तियाँ, और मेजों पर कविता लिखी कागज की कतरनें........शीर में कमरों के नाम तुर्क के बड़े कवियों के नाम पर रखे गए हैं। कुछ कमरे कवियों के लिए इस तरह से सुरक्षित हैं कि वे जब चाहे आकर रह सकते हैं।कमरों के भीतर श्वेत सज्जा के साथ दीवार पर कवि और कविता की चित्रमय प्रस्तुति..शीर के चर्चा कक्ष में दुनिया के बड़े- बड़े कवियों के चित्र और उनकी कविताएँ खुबसूरती से सज्जित हैं। भोजन कक्ष में कविता-वृक्ष है, जिसमें दुनिया के कवियों की कविता हाथ से लिख कर पत्तों की तरह टाँगी गई है.वातावरण में बेहद सादगी और शाइस्तगी....कहते हैं कि नसरुद्दीन होड्जा ने यहाँ की फिजा में, हवा में, वादियों कविता देखी थी
इसात ने उसे साकार किया, इसात के सपने एक पाखी आयी, प्यार के शब्दों को चुनने के लिए, उसने पहाड़ों घाटियों , नदियों और नहरों में से प्यार के शब्दों को चुना ... और इसात को थमा गई...इसात ने रेत गारे और सीमेन्ट को कविता में मिलाया, इस्पात और कान्क्रीट से  कविता को मजबूत किया, रंग रोशन में कविता के छींटे दिए, और शीर होटल यानी कि शायरी का होटल बनाया ...,

मैं नहीं जानती कि व्यवसायिकता के इस दौर में शायरी के घर का क्या मुकाम !
मैं नहीं जानती कि युद्ध की विभीषिका में प्रेम का क्या मुकाम !
मैं बस यह समझ रही हूँ कि कुछ भी नामुमकिन नहीं...
कल्पना का हकीकत में बदलना, या फिर हकीकत काकल्पना में साकार होना.

21 मार्च की रात को जब मैं दिल्ली के हवाई अड्डे में पहुँची तो उतनी परेशानी नहीं हुई, जितनी कि मुम्बई के हवाई अड्डे में हुआ करती थी। चैंकिग आदि का काम काफी जल्दी ही हुआ, लेकिन सबसे अच्छा अनुभव वीसा काउण्टर में हुआ...आफीसर ने पूछा... कहिए मैडम बच्चों से मिलने जा रही हैं? मैंने कहा - नहीं कवितोत्सव में। उसे इस जवाब की आशा नहीं थी, आजकल मेरी उम्र की अधिकतर महिलाएं विदेशों की यात्रा अपने बच्चो के बच्चों की आयागिरी करने को जो किया करती हैं। वह पूछने लगा-आप लिखती हैं, क्या किताब भी है...
मैंने कहा कि संभवतया लिखने के कारण ही बुलाया जा रहा है। और अपना कार्ड उसे दे दिया.. गूगल सर्च कर लीजिए.. वह कहने लगा..मैडम मुझे भी लिखने पढ़ने का शोक है, इसलिए पूछा था।
चलों शुरुआत एक पढ़े लिखे आदमी के दर्शन से हुई.मन खुश था...लेकिन अब समस्या थी वक्त काटने की...फ्लाइट सुबह की थी, और मै रात के एक बजे ही चेकिंग कर चुकी थी, ना सो सकती थी, क्यों कि साथ एक बैग था और मैं अकेली थी

अकेले सफर करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि हम पूरे वक्त आसपास से परिचित होते रहते हैं. कोई साथ हो तो हम बतियाने मे् मशगूल हो जाते हैं...मैं कुछ वक्त बैठती, तो कुछ वक्त टहलती, किसी तरह से चार बजे तो हमे आखिरी पड़ाव में बैठने पर मौका मिला। मुझे आश्चर्य हुआ कि यहाँ सुरक्षा जाँच बेहद सहज थी, कोई खास बन्धन नहीं... यह फ्लाइट इस्ताम्बुल जा रही थी, लेकिन यूरोपियन देश के काफी यात्री थे, जो वहाँ से आगे की उड़ान लेने वाले थे। मैं देख रही थी कि अनेक विदेशी गेरुँआ वस्त्र पहने हुए ठेठ वृन्दावन वाली वेशभूषा में थे। विकास सर्पोमुखि होता है. जहाँ से शुरुआत, वही पर अन्त। ये युवक उन देशो के होंगे जहाँ हमारे युवक जाने को लालायित रहते हैं और वहाँ के नवयुवक यहाँ शान्ति की खोज में। दोनों की खोज छद्म है, संभवतया वे ताउम्र जान भी नहीं पाते... लेकिन हर सिद्धार्थ के भाग्य में बुद्ध बनना थोड़े बदा होता है।

एक युवति केसरी लहंगा और ओढ़नी पहने, गले में मालाएँ पहने मेरे पास बैठती है। मैं उसकी तरह देख कर मुस्कुराती हूँ तो वह मुस्कुराहट में जवाब देती है। मैं उससे कुछ पूछना चाहती हूं, लेकिन इस तरह कि उसे बुरा ना लगे।
किसी आश्रम से लौट रही हैं आप? -मैंने उस युवती से अंग्रेजी में पूछा।
जी हाँ आश्रम से ही.- उसने किसी आश्रम का नाम लिया, जो मुझे याद भी नहीं।
वहाँ क्या करती हैं? मैंने हिचकते हुए पूछा
बस भजन गाना, मन्दिर की सफाई करना, माला जाप करना.. उसमे जवाब दिया। मैं विस्मित थी, इतने भर से कोई आनन्द कैसे पा लेता है। उस महिला के माथे पर चन्दन की बिन्दियों से लग रहा था कि वह राधावल्लभ जैसे किसी सम्प्रदाय वाले आश्रम में जाती रही होंगी।
क्या आप अपने देश में भी ये वेशभूषा पहनती हैं? मेरा अगला सवाल था।
नहीं, मैं छह महिने नौकरी करती हूँ, और फिर छह महिन भारत आती हूँ, उसपैसे से छह महिने काम चला लेती हूँ।
क्या नौकरी?
हर बार नई खोजनी पड़ती है, क्यों कि लग कर काम ज्यो नहीं कर पाती

मुझे वे पंछी याद आय, जो वर्ष के छह महिने उड़ कर दूरस्थ देशों में जाते हैं और फिर लौट कर अपने डैने मे लौट आते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी , उनका मार्ग नही बदलता, उनकी यात्रा का प्रयोजन भी नहीं...मुझे वह युवती प्रवासी पंछी लगी, जिसकी यात्रा का गन्तव्य मुझे तो समझ नहीं आया।

इस्तान्बुल में मेरे पास काफी वक्त था, डेन्जिली के लिए मेरा जहाज शाम को था, मुझे अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से अन्तर्देशीय अड्डे की ओर जाना था। इस देश में आते ही मुझे यही लगने लगा कि मैं भाषा नामक वस्तु से पूर्णतया अपरिचित हूँ। सब कुछ तुर्की भाषा में था। इशारो के साथ में जब देशीय हवाई अड्डे में पहुँची तो मेरे लिए वक्त मानो थम सा गया। मैंने अपने साथ कोई पुस्तक रखी नहीं थी। हवाई अडथडे में अंग्रेजी के नाम पर अखबार तक नहीं था। मैं घूम घूमकर दूकानों के चक्कर लगाती रही। फिर थक कर बैठ जाती,लेकिन वक्त बिताना बेहद मुश्किल होता जा रहा था। पुस्तकों की दूकानों पर अंग्रेजी में एक भी किताब नहीं....

किसी तरह शाम के चार जे तो मुझे रकेल और अतौल दिखाई दिये, वे भी इसी फ्लाइट से डेंजिली जा रहे थे। मुझे देख कर वे दोनों खुश हुए. मुझे पता चला कि रकेल पूरे दो दिनों से इस्तानबुल में है. खूब घूम रही है.... काश मैं भी....

जब हम डेन्जिली पहुँचे तो अन्य कवि नील हैव  (डेनमार्क) Niels Hav दिखाई दिए। वातावण में खुनक थी, लेकिन हवा बेहद तेज चल रही थीं। मुझे कस कर ठण्ड लगने लगी। रकेल ने अपना लेडर का जेकेट मुझे दिया.... मैं तो स्वेटर लेकर आई थी.... और ऐसी हवा में स्वेटर काम ही नहीं कर सकता था।

जब हम लोग होटल शीर पहुँचे तो रात हो चुकी थी, लेकिन अनेक लोग हमारा इंतजार कर रहे थे। सारी बाते या तो तुर्की में हो रही थी, या फिर फैंच में। मैं सब चेहरों को दीमाग में दर्ज करने की कोशिश कर रही थी।

कहा गया कि हमें थोड़ी देर में नीचे डिनर के लिए पहुँचना है।

मैं जब कमरे में पहुँची तो विश्वास ही नहीं कर सकती कि कोई कमरा इतना काव्यात्मक हो सकता है.. कमरे की दीवारों पर कविताए जड़ी थी. हर जगह कविताओं के पर्चे रखे थे।

मुझे घर से निकले पूरे ३० घण्टे बीत गए, इसलिए अच्छा सा शावर लेना चाहती थी, निसन्देह भोज आरम्भ हो चुका था, लेकिन मेरे लिए कुर्शी खाली रखी थी...
यहीं पर मुझे होटल शीर की कहानी सुनने को मिली, यही पर तुर्क के समकालीन कवियों से परिचय हुआ।